यांत्रिक लीवर कम ताकत लगाकर ज्यादा भार उठाता है। इसी से निकला है लीवरेज़, वित्तीय बाज़ार में जिसका मतलब होता है कम धन या मार्जिन लगाकर ज्यादा कमाने का मौका। यह डेरिवेटिव्स, खासकर फ्यूचर्स में चलता है। मान लें, किसी स्टॉक में 5% मार्जिन है और वो 1% बढ़ता है तो आपका असल फायदा 20% होता है। पर गिरने पर घाटा भी इतना तगड़ा होता है। भरपूर रिस्क तो भरपूर फायदा। आइए अब चलाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी

एक आम ट्रेडर होने के नाते न तो आपके पास बड़े-बड़े स्क्रीन हैं, न ही बहुत तेज़ कनेक्शन या उन्नत चार्टिंग सॉफ्टवेयर जो पलक झपकते सारी तस्वीर साफ कर दे। पूंजी भी ज्यादा नहीं। इसके बावजूद सामनेवाले पर बीस पड़ना है तभी ट्रेडिंग से कमा सकते हैं। इसके लिए एक अंतर्दृष्टि बनाने की ज़रूरत है जिसे हासिल आपको ही करना है। हम इसमें बस आपका सहयोग करते और अभ्यास कराते हैं। अब परखते हैं मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

सच्चा दोस्त वह है जो आपको संकट में डूबने नहीं देता। लेकिन धंधे में सगा भाई तक सगा नहीं होता! फिर, ब्रोकर, कंपनी या सलाहकार लाख ‘कस्टमर फर्स्ट’ का दावा करें, दरअसल उनका अपना फायदा ही सर्वोपरि होता है। इसलिए धंधे में आपको खुद ही अपना सच्चा दोस्त चुनना होता है। ट्रेडिंग में ऐसा ही सच्चा दोस्त है स्टॉप-लॉस जो आपको बचाता है और घाटे की दलदल में धंसने नहीं देता। अब परखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

ट्रेडिंग में हम किसी शेयर के तात्कालिक आवेग को भुनाते हैं। इसलिए हफ्ते, दस दिन या महीने, दो महीने में फायदा कमाकर वहां से निकल लेते हैं। लेकिन, जब हम अच्छे प्रवर्तक की बढ़ते धंधे में लगी उभरती कंपनी में निवेश करते हैं तो फटाफट निकलने की कतई नहीं सोचनी चाहिए क्योंकि उसका बिजनेस बराबर बढ़ते जाना है जिसके ताप से उसका शेयर भी चढ़ता चला जाता है। आज तथास्तु में ऐसी ही एक और संभावनामय कंपनी…औरऔर भी

अमिताभ बच्चन से लेकर सचिन तेंदुलकर तक को भगवान माननेवालों की कमी नहीं। पर हकीकत यही है कि किसी को भी भगवान मानने से अपना भला नहीं होता, भले ही उनकी मार्केटिंग वालों का भला हो जाए। इसी तरह ट्रेडिंग में भावों को भगवान माना जाता है। मगर, वास्तव में भाव कंपनी का सच नहीं, ट्रेडरों की भावनाओं का सच दिखाते हैं। इसीलिए हताशा और उन्माद के पेन्डुलम पर झूलते हैं। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी