इंसान की तरह कंपनियों के भी जीवन में एक दौर बनने और जमने का होता है। इस दौरान उसे बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं। लेकिन इस दौर की समाप्ति के बाद जीवन एक ढर्रा पकड़ लेता है और बेरोकटोक आगे बढ़ता जाता है। जहां इंसान के जीवन का अंत निश्चित है, वहीं कंपनियों का जीवन अनंत है। अनिश्चितता हालांकि कभी खत्म नहीं होती। आज तथास्तु में बनने से लेकर जमने के दौर तक पहुंची एक कंपनी…औरऔर भी

बैंकों या बीमा कंपनियों के लिए कुछ दिनों में 4-5% का मुनाफा पर्याप्त होता है। इतना मुनाफा पाकर वे पहले निकल लेते हैं। फिर शेयर वहां से 2% तक गिर गया तो दोबारा खरीद लेते हैं। जब तक शेयर का भाव निर्धारित लक्ष्य तक नहीं पहुंच जाता, तब वे उसे इसी तरफ फेटते रहते हैं। उनका एक-एक सौदा करोड़ों का होता है, इसलिए 4-5% फायदा भी उन्हें आराम से लाखों दे जाता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बैंक, संस्थाएं या प्रोफेशनल ट्रेडर रिटेल ट्रेडरों की तरह सारे शेयर एकमुश्त नहीं खरीदते। वे धीरे-धीरे कुछ दिनों में पोजिशन बनाते हैं। साथ ही वे सौदा एक नहीं, बल्कि कई ब्रोकरों के ज़रिए करते हैं। एक बार उनको वांछित मात्रा में शेयर मिल जाते हैं, फिर वे फेटना शुरू कर देते हैं। लेकिन इंट्रा-डे कतई नहीं। बैंकों की न्यूनतम होल्डिंग अवधि ट्रेडिंग वाले दिन को छोड़कर दो दिन, यानी टी+2 की होती है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ऑपरेटरों के खेल को हमें दूर से ही नमस्कार कर देना चाहिए। लेकिन बैंकों, संस्थाओं व प्रोफेशनल ट्रेडरों के तौर-तरीकों को हम समझ सकते हैं और हमें समझना भी चाहिए। यूं तो इनमें सबकी अलग-अलग ट्रेडिंग स्टाइल होती है। लेकिन यह बात सबमें समान है कि वे फंडामेंटल रूप से मजबूत और लिक्विड कंपनियों में ही ट्रेड करते हैं। लिक्विड मतलब ऐसी कंपनियां जिनके लाखों शेयरों की ट्रेडिंग औसतन हर दिन होती है। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में सक्रिय ऑपरेटरों के खेल निराले हैं। तमाम ऑपरेटर कंपनी प्रवर्तकों के साथ मिलकर खेल करते हैं। दरअसल, प्रवर्तकों के पास कंपनी के शेयर घोषित मात्रा से कहीं ज्यादा होते हैं। वे अन्य व्यक्तियों या फर्मों के नाम से शेयर लेकर रखते हैं और इनके ज़रिए अपनी कंपनी के शेयरों को उठाते-गिराते हैं। इन ऑपरेटरों से तो पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी तक नहीं पार पाती। हमें इनसे सतर्क रहना चाहिए। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी