अपनी अंतर्निहित शक्ति और संभावनाओं की बदौलत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती भारत की अर्थव्यवस्था मोदी सरकार की नीतियों के चलते इस समय दो पाटों के बीच फंसती नज़र आ रही है। सपना है कि दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका भारत साल भर में चौथी और तीन साल में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। मगर दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने ही इस विकासयात्रा में फच्चर फंसा दिया है। सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाऔरऔर भी

मुबई में किसी ने साल 2005 में ₹30 लाख का फ्लैट खरीदा होता तो वो दस साल में एक करोड़ और अब तक बीस साल में दो करोड़ से ऊपर का हो गया होगा। म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीम में कोई ₹35,000 प्रति माह की एसआईपी करे तो 15% सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न के हिसाब से दस साल में उसका धन एक करोड़ रुपए हो जाएगा। हालांकि इस दौरान उसका कुल सीधा-सीधा निवेश ₹42 लाख का होगा। लेकिनऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में हम-आप जैसे ट्रेडर-निवेशक खरीदने-बेचने के जो भी सौदे करते हैं, उनकी स्पष्ट लागत होती है जो हर हाल में बिचौलियों से लेकर सरकार तक को मिलती है। सेबी के एक विश्लेषण के मुताबिक वित्त वर्ष 2021-22 में ट्रेडिंग में घाटा खानेवाले ट्रेडरों को इसका 28% हिस्सा घाटे के ऊपर सौदों की लागत के रूप में देना पड़ा था। जिन ट्रेडरों ने ट्रेडिंग में मुनाफा कमाया, उनके मुनाफे का लगभग 50% हिस्सा ट्रांजैक्शन लागत मेंऔरऔर भी

ऊपर-ऊपर देखें तो हमारी पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी का मूल उद्देश्य निवेशकों के हितों की हिफाजत करते हुए सिक्यूरिटीज़ बाज़ार का विकास व नियमन करना है। लेकिन सतह के नीचे देखें तो सेबी सिक्यूरिटीज़ बाज़ार को बढ़ाने के लिए निवेशकों के हितों को दरकिनार करती रही है। जैसे, इंट्रा-डे ट्रेडिंग शेयर बाज़ार में कैश सेगमेंट का सबसे रिस्की हिस्सा है। लेकिन शुरुआत से ही उसने नियम बना रखा है कि केवल रिटेल व्यक्तिगत निवेशक/ट्रेडर ही इंट्रा-डेऔरऔर भी