अनिश्चितता ही शेयर बाज़ार का दुख है, सुख है। थ्रिल और अवसाद में डुबाने का कारण भी। इस समय शेयर बाज़ार पर यही अनिश्चितता छाई है। वो भी छोटी-मोटी नहीं, अपने चरम पर। रूस-यूक्रेन का युद्ध जारी है। शायद 15 अगस्त को पुतिन-ट्रम्प की मुलाकात के बाद थम जाए। मध्य-पूर्व में इस्राइल-ईरान का युद्ध थम गया तो इस्राइल ने सीरिया पर हमला कर दिया। पूरा इलाका अब भी सुलग रहा है। ऊपर से ट्रम्प का सारी दुनियाऔरऔर भी

सत्ता शीर्ष पर बैठे व्यक्ति की हरकतों से समूचे देश का नुकसान होता है। नंवबर 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी सनक या साजिश में नोटबंदी लागू की तो देश के जीडीपी को 1.5% से 2% का नुकसान हो गया। हमारी अर्थव्यवस्था की जो विकास दर 8% के करीब जा पहुंची थी, वो नोटबंदी के बाद 6% तक सिमट गई। अब अमेरिका का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी अपनी सनक में भारत के आयात पर 50% टैरिफऔरऔर भी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दुनिया के तमाम देशों पर जवाबी टैरिफ लगाने का जो अभियान इस साल 2 अप्रैल के ‘लिबरेशन दिवस’ से शुरू किया, उससे पहले ही मोदी सरकार ने अमेरिका के मनभावन फैसले लेने शुरू कर दिए थे। वो तब तक इलेक्ट्रिक वाहनों पर आयात शुल्क 110% से घटाकर 15% करने और डिजिटल विज्ञापनों पर लग रहा 6% गूगल टैक्स खत्म करने का ऐलान कर चुकी थी। ट्रम्प ने जवाबी टैरिफ की घोषणा कीऔरऔर भी

भारत के खिलाफ टैरिफ डोनाल्ड ट्रम्प ने लगाया है। लेकिन अग्निपरीक्षा 11 साल से देश की सरकार चला रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीतियों की हो रही है। सवाल उठ रहा है कि क्या सचमुच मोदी सरकार की कोई आर्थिक नीति है भी या सब कुछ हवाबाज़ी और जुमला है। नहीं तो ऐसा कैसे होता कि भारत की जो कृषि पूरी तरह राम-भरोसे है, उसकी सालाना चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) वित्त वर्ष 2019-20 से 2024-25 तक पांचऔरऔर भी

भारत के खिलाफ 1971 के बाद पहली बार ऐसा हो रहा है कि पाकिस्तान को केंद्र में रखकर चीन और अमेरिका एक धुरी पर आ गए हैं, जबकि भारत को रूस के साथ अपने रिश्तों को बचाना पड़ रहा है। यह तीन दशकों से चली आ रही भारत की उस विदेश नीति की घनघोर पराजय है जिसमें पाकिस्तान व चीन के गठजोड़ के खिलाफ अमेरिका को सायास साथ रखा गया था। लेकिन इस हकीकत को समझने केऔरऔर भी