मर्ज क्यों बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की!
पैसे से पैसा कैसा बनाया जाए – इसकी तलाश दुनिया में हर किसी को रहती है। बिना यह जाने कि पैसे में जो खरीद-फरोख्त की शक्ति आती है, आखिर उसका स्रोत क्या है? भारत में पैसे से पैसा बनाने की यह दीवानगी करीब 1.07 करोड़ लोगों पर सवार है जो शेयर बाज़ार में सक्रिय ट्रेडिंग करते हैं, कैश सेगमेंट से लेकर डेरिवेटिव सेगमेंट तक में। डेरिवेटिव्स में भी ज्यादातर व्यक्तिगत ट्रेडर इंडेक्स ऑप्शंस और स्टॉक ऑप्शंस मेंऔरऔर भी
जिस पर वश, उसे संभालें, बाकी रिस्क!
शेयर बाज़ार को कितने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय कारक किस हद तक प्रभावित कर रहे हैं, क्या इसे हम-आप तो छोडिए, कोई विशेषज्ञ भी सही-सही सटीक रूप से जान सकता है? आप कहेंगे कि भले ही विशेषज्ञ न जान सके, लेकिन आज लार्ज लैंग्वेज़ मॉडल (एलएलएम) पर काम कर रहे एआई टूल्स तो ज़रूर जानकर हमें बता सकते हैं। मगर, एआई टूल्स भी तो जो पहले से उपलब्ध है, उसे ही ताश के पत्तों की तरह शफल करकेऔरऔर भी
गरीबों के लिए ज्यादा चमके सोना-चांदी!
मध्यवर्ग खर्च चलाने के लिए बैंकों व एनबीएफसी से ऋण लिये जा रहा है। कॉरपोरेट क्षेत्र पूजी निवेश के बजाय कैश बचा रहा है और बैंकों से ऋण लेने से कतरा रहा है। लेकिन देश के उन 81.35 करोड़ गरीबों का क्या जो हर महीने सरकार से मिल रहे पांच किलो मुफ्त राशन पर निर्भर हैं? यह आश्चर्यजनक, किंतु सच है कि भारत के गरीब अमीरों की बनिस्बत ज्यादा धन सोने में लगाकर रखते हैं। सरकार केऔरऔर भी
आम लोग ऋण से दबे, कॉरपोरेट मुक्त!
रिजर्व बैंक का डेटा बताता है कि ‘हम भारत के लोगों’ की वित्तीय आस्तियां वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़कर ₹34.3 लाख करोड़ और देनदारियां ₹18.8 लाख करोड़ यानी, देनदारियां आस्तियों की 54.81% हो गईं। यह 1970-71 के बाद के 53 सालों का सर्वोच्च स्तर है। कोरोना से घिरे वर्ष 2021-22 तक में लोगों की देनदारियां आस्तियों की 34% थीं। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक कोविड के बाद से ही लोगबाग बचा कम और उधारऔरऔर भी






