उद्योग-धंधे त्रस्त हैं ‘टैक्स-आतंकवाद’ से
सरकारी मंजूरियां देश में बिजनेस करनेवालों के जी का जंजाल बनी हुई है। एक एमएसएमई इकाई शुरू करने के लिए बार-बार 57 अनुपालन और केवल पर्यावरण, स्वास्थ्य व सुरक्षा से जुड़े 18 विभिन्न अधिकारियों से 17 अनुमोदन/लाइसेंस लेने पड़ते हैं। हमारे कानून में उद्योग-धंधे संबंधी 75% रेग्य़ुलेशन ऐसे हैं जिनमें जेल तक की सज़ा का प्रावधान है। तमाम सरकारी एजेंसियां बिजनेस करनेवालों से डरा-धमकाकर वसूली करती रहती हैं। भ्रष्टाचार को पालते-पोसते ऐसे माहौल के ऊपर हर बिजनेसऔरऔर भी
सरकार ही सरकार, उद्योग-धंधा नदारद
मोदी सरकार देश की अर्थव्यवस्था के साथ 11 सालों से जीडीपी को बढ़ाकर दिखाने का छल कर रही है, जबकि ज़मीनी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। खपत घट रही है। लोगों पर कर्ज बढ़ रहे हैं। कंपनियां देश में नया निवेश न करके बाहर भाग रही हैं। आम लोगों पर ही नहीं, उद्योग धंधों पर भी टैक्स का बोझ बढ़ता जा रहा है। जिस सॉफ्टवेयर क्षेत्र ने जमकर नौकरी दे रखी थी, वो छंटनीऔरऔर भी
समस्याओं के बीच उछला कैसे जीडीपी!
जब रिजर्व बैंक तक मौद्रिक नीति समीक्षा में चालू वित्त वर्ष 2025-26 की पहली या जून तिमाही में जीडीपी की विकास दर के बहुत हुआ तो 6.5% रहने का अनुमान जा रहा था, तब सरकार ने शुक्रवार, 29 अगस्त को घोषित किया कि हमारा जीडीपी असल में 7.8% बढ़ा है। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. नागेश्वरन ने जब प्रेस कॉन्फेंस में यह घोषणा की तो सभी अचंभित रह गए। हर तरफ जब अर्थव्यवस्था में समस्याएं ही समस्याएं दिखऔरऔर भी
युद्ध हो या शांति, बिजनेस चलता ही रहे
रूस-यूक्रेन युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा। मध्य-पूर्व में इस्राइल ने सबके साथ युद्ध छेड़ रखा है। कभी ईरान तो कभी सीरिया और कभी यमन। गाज़ा में युद्ध-विराम की कोशिशों के बावजूद वो फिलिस्तीनियों को मिटाने तुला है। अपने यहां पहलगाम का आतंकी हमला। फिर ऑपरेशन सिंदूर और पाकिस्तान के साथ जंग। हर तरफ छाए युद्ध के इन हालात से भारत ही नहीं, दुनिया भर के शेयर बाज़ार हलकान हैं। लेकिन इसका मतलब नहीं कि बिजनेसऔरऔर भी






