साल 2025 का आखिरी महीना। इसी महीने के पहले दिन बीएसई सेंसेक्स 86,159.02 और एनएनई निफ्टी 26,325.80 के नए ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गया। उसके बाद से मुनाफावसूली जारी है। फिर भी इस वक्त सेंसेक्स 23.26 और निफ्टी 22.68 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। पी/ई अनुपात ही मूलतः वो पैमाना है जिससे पता चलता है कि कोई स्टॉक या सूचकांक, मतलब बाज़ार महंगा है या नहीं। निफ्टी का पी/ई अनुपात 20 से नीचे रहताऔरऔर भी

जीडीपी का डेटा ऊपर-ऊपर जैसा दिखाता है, अंदर घुसने पर पता चलता है कि वैसा कतई नहीं है और हकीकत बड़ी दारुण है। आखिर जीडीपी का बढ़ना और निजी क्षेत्र के घटिया प्रदर्शन एक साथ कैसे? जीडीपी में निजी क्षेत्र से जुड़े दो सबसे बड़े हिस्से हैं पीएफसीई (प्राइवेट फाइनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर) या निजी खपत पर होनेवाला खर्च और निजी क्षेत्र का पूंजी निवेश। निजी खपत बढ़ती है तो निजी पूंजी निवेश भी बम-बम करता है। लेकिनऔरऔर भी

संयोग या प्रयोग से सत्ता में हाथ में आ जाए और लोकतांत्रिक संस्थाओं को पंगु बनाकर येनकेन प्रकारेण सत्ता में बने रहने की सिद्धि हासिल कर ले तो किसी भी सत्ताधारी दल को गुमान हो जाता है कि वो भोलेभाले आम लोगों को ही नहीं, मीडिया से लेकर बुद्धिजीवियों व अर्थशास्त्रियों तक को चरका पढ़ा सकता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसा कभी लम्बे समय तक नहीं चलता। शासन की नंगई एक न एक दिन सबसेऔरऔर भी

जब विश्व अर्थव्यवस्था की विकास दर 2.5% से 2.6% पर अटकी पड़ी हो, सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका के इस साल 2025 में बहुत हुआ तौ 1.6% बढ़ने का अनुमान वहां का केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व जता रहा हो, दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन की विकास दर घटकर 4.5% पर आ गई हो, तब भारत की अर्थव्यवस्था का इस साल जून तिमाही में 7.8% और सितंबर तिमाही में 8.2% बढ़ जाना किसी को भी हतप्रभ कर सकता है।औरऔर भी

कभी-कभी इतिहास किसी तारीख या घटना से नहीं, बल्कि किसी सवाल से शुरू होता है। कैसे ऐसा हुआ कि समझदार लोग, शिक्षित समाज और सत्ता के गलियारों में बैठी बुद्धि एक साथ भ्रम में डूब गई? ‘साउथ सी बबल’ इसी सवाल की जन्मभूमि है। यह केवल शेयरों के चढ़ने और गिरने की कहानी नहीं है, बल्कि उस क्षण की कथा है जब तर्क ने भीड़ के सामने हथियार डाल दिए, जब भविष्य की चमक ने वर्तमान कीऔरऔर भी