कंप्यूटर पर एक की गलत दब जाने के क्या हो जाता है, इसका उदाहरण है कि आज बाजार में रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) के 5 लाख शेयर गलती से बिक गए। सूत्रों के मुताबिक यह गलती ब्रोकर फर्म इंडिया इंफोलाइन (आईआईएफएल) के एक डीलर से हुई है। डीलर को आईसीआईसीआई बैंक के 5 लाख शेयर बेचने थे। लेकिन गलती से बटन आरआईएल पर दब गया। और फिर क्या था, सेकंडों में चलनेवाले बाजार में बिक गए आरआईएल केऔरऔर भी

जीवन बीमा कंपनियों का धंधा चौचक चल रहा है। अप्रैल, 2010 में उन्होंने कुल 5746.33 करोड़ रुपए का प्रीमियम इकट्ठा किया है। यह रकम अप्रैल, 2009 के कुल 3601.58 करोड़ रुपए के प्रीमियम से 59.55 फीसदी अधिक है। देश में कुल 23 जीवन बीमा कंपनियां सक्रिय हैं। 22 निजी क्षेत्र की और एक एलआईसी। लेकिन अकेले एलआईसी बाकी 22 पर भारी है। अप्रैल 2010 में उसका प्रीमियम संग्रह 4173.69 करोड़ रुपए रहा है जो सारी बीमा कंपनियोंऔरऔर भी

शुक्रवार, 28 मई को बाजार बंद होने के बाद हमने कर्नाटक बैंक के बारे में लिखा था कि कैसे वह अधिग्रहण के लिए बहुत सस्ता लक्ष्य हो सकता है। तब उसका बंद भाव बीएसई में 150.75 रुपए था। कर्नाटक बैंक के बारे में ऐसी कोई सूचना या कयास किसी भी मीडिया में मैंने नहीं देखा। लेकिन सोमवार को यह शेयर बीएसई में 13.17 फीसदी बढ़कर 170.60 पर बंद हुआ। ऊपर में तो यह करीब 16.5 फीसदी बढ़करऔरऔर भी

छोटा-सा दायरा। चंद लोगों की वाहवाह। अपनी ही छवियों पर मंत्रमुग्ध। ये सब हमारे अंदर ऐसी गर्द जमाते रहते हैं कि हमें कुछ का कुछ दिखने लगता है। इसलिए दिमाग पर बराबर वाइपर चलाते रहना जरूरी है।और भीऔर भी

इस समय पूंजी बाजार से रिटेल निवेशक या आम निवेशक कन्नी काट चुके हैं। सेकेंडरी बाजार या शेयर बाजार में उनका निवेश लगभग सूख चुका है। दूसरी तरफ, जो प्राइमरी बाजार कुछ साल पहले तक आम निवेशकों का पसंदीदा माध्यम बना हुआ था, वहा भी अब आईपीओ (शुरुआती पब्लिक ऑफर) व एफपीओ (फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर) में लोगबाग पैसे नहीं लगा रहे हैं। लगाएं भी तो कैसे। कमोबेश हर आईपीओ या एफपीओ लिस्ट होने के बाद इश्यू मूल्यऔरऔर भी

पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने तय कर दिया है कि 1 जून 2010 के बाद से कोई भी व्यक्ति तब तक किसी भी रूप में म्यूचुअल फंड उत्पाद नहीं बेच सकता, जब तक उसने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सिक्यूरिटीज मार्केट्स (एनआईएसएम) से जरूरी परीक्षा पास कर सर्टिफिकेट न हासिल कर लिया हो। यह शर्त म्यूचुअल फंड के वितरकों व एजेंटों से लेकर ऐसी किसी भी व्यक्ति पर लागू होती है जो किसी न किसी रूप में म्युचुअलऔरऔर भी

कोई आपसे पूछे कि भारतीय अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है तो आप बेझिझक बता सकते हैं कि यह अभी 44,64,081 करोड़ रुपए की है, वह भी तब जब इसमें से 2004-05 के बाद की मुद्रास्फीति या महंगाई के असर को निकाल दिया गया है। अगर सारा कुछ आज की कीमत के हिसाब से बोलें तो हमारी अर्थव्यवस्था का आकार 58,68,331 करोड़ रुपए का है। लेकिन हम महंगाई के असर को जोड़कर नहीं, हटाकर ही बात करते हैं क्योंकिऔरऔर भी

देश की आबादी करीब 118 करोड़ हो चुकी है। लेकिन हमारे सभी बैंकों में कुल बचत खातों की संख्या केवल 15 करोड़ है। ऐसा तब है जबकि भारत में दुनिया का सबसे बड़ा बैंकिंग तंत्र है जिसमें कुल करीब 79,000 शाखाएं व एटीएम वगैरह शामिल हैं। रिजर्व बैंक, नाबार्ड व राज्य सरकारों की तमाम कोशिशों के बाद 8.6 करोड़ घरों तक स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के जरिए बैंकिंग सेवा को पहुंचाया गया है। देश भर में बचतऔरऔर भी

हमारी दो-तिहाई खेती अब भी मानसून आधारित है। मौसम और मानसून खराब हुआ तो इन इलाकों की सारी फसल चौपट हो जाती है, किसान बरबाद हो जाते हैं। सरकार ने कहने को राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एनएआईएस) चला रखी है। मौसम आधारित फसल बीमा योजना (डब्ल्यूबीसीआईएस) भी है। इसके लिए मौसम के सही आंकड़ों का होना जरूरी है। लेकिन अभी स्थिति यह है कि देश में कुल 14.10 लाख हेक्टेयर जमीन में खेती की जाती है, जबकिऔरऔर भी

पानी बहता नहीं तो सड़ता है। यही बात पैसे और बचत पर भी लागू होती है। बांधकर रखेंगे तो वह घुटता रहेगा, क्षीण होता रहेगा। पैसे को पानी की तरह बहाना गलत है। लेकिन उसे सही माध्यमों में निवेश करना जरूरी है।और भीऔर भी