यह वाकई बड़े अचम्भे की बात है। वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में नॉमिनल जीडीपी पुरानी सीरीज में ₹86,05,365 करोड़ था, जबकि रीयल जीडीपी ₹47,88,623 करोड़ था। आखिर डेरिवेटिव या निकाला गया रीयल जीडीपी बाज़ार मूल्य के नॉमिनल जीडीपी से 44.35% कम क्यों? मुद्रास्फीति को बेअसर करने का यह कैसा डिफ्लेटर था जिसने गुब्बारे की 44.35% हवा निकाल दी थी? सरकारी अर्थशास्त्रियों व आर्थिक विश्लेषकों की जमात इतने बड़े अंतर का रहस्य खोलने के बजाय तंज कसती रही कि नॉमिनल जीडीपी को घटाकर 10.3% की विकास दर दिखाना गलत है तो रीयल जीडीपी की तुलना कर लेते। तब तो वो 70% (69.91%) बढ़ गया होता क्योंकि पुरानी सीरीज़ में 2025-26 की जून तिमाही का रीयल जीडीपी ₹47,88,623 करोड़ था, जबकि चालू वित्त वर्ष 2026-27 की जून तिमाही में नई सीरीज के तहत यह ₹81,36,153 करोड़ रहा है। ज़रा पूरा माज़रा समझ लीजिए। 2025-26 की पहली तिमाही के नॉमिनल जीडीपी को 7.03% दबाकर 80,00,192 करोड़ किया गया ताकि 2026-27 की पहली तिमाही के ₹88,26,871 करोड़ के जीडीपी को 10.3% बढ़ा हुआ दिखाया जा सके। लेकिन जगहंसाई न हो जाए तो इस अवधि के रीयल जीडीपी को ₹47,88,623 करोड़ से सीधे 57.59% उछालकर ₹75,46,230 करोड़ कर दिया गया ताकि ₹81,36,153 करोड़ के रीयल जीडीपी पर 7.8% की सुसंगत विकास दर दिखाई जा सके। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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