मोदी सरकार एक तरफ स्वदेशी, आत्मनिर्भर भारत और मेक-इन इंडिया का राग अलाप रही है, दूसरी तरफ स्थिति यह है कि देश का 30.8% औद्योगिक माल चीन से बनकर आ रहा है। वित्त मंत्रालय ने कई साल से सीमावर्ती देशों की कंपनियों पर हमारे सरकारी टेंडरों में भाग लेने पर बंदिशें लगा रखी हैं। लेकिन अचानक 24 जून को मंत्रालय ने आदेश जारी करके भारत में फैक्ट्रियां चला रही चीन की चार कंपनियों को ऐसी बंदिशों से मुक्त कर अहम बिजली परियोजनाओं के टेंडर में भाग लेने की इजाज़त दे दी। क्या इसलिए कि अदाणी समूह ने भारत से लेकर चीन तक बिजली क्षेत्र में एक घना जाल बुन रखा है और चीन की कंपनियां अदाणी के लिए पिछले दरवाज़े का काम कर रही हैं? मोदी सरकार की ऐसी यार-परस्ती से देश के मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का भट्ठा बैठ गया है और पिछले कई सालों से उद्योग-धंधों से कृषि की तरफ कामगारों का उल्टा पलायन हो रहा है। 2020 में कृषि में लगे श्रमिकों की संख्या करीब 20 करोड़ हुआ करती थी। यह 2024 तक 28 करोड़ पर पहुंच गई। बाहर कोई काम-धंधा नहीं तो आठ करोड़ मजदूर खेती की तरफ लौट गए। कुछ नहीं तो मनरेगा था। लेकिन अब उसका भी ‘राम नाम सत्य’ हो गया। 2025 तक वहां से केवल 1.50 करोड़ लोग वापस निकले हैं। बाकी 26.5 करोड़ कामगार अब भी कृषि में खपे पड़े हैं। अब बुधवार की बुद्धि…
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