सच्चाई बड़ी बेरहम होती है। वो किसी पर कोई दया-माया नहीं दिखाती। मोदी सरकार ने बारह साल में अपने कर्मों से भारतीय अर्थव्यवस्था को जिस मुकाम पर ला पटका है, वो बेहद दुखद व खतरनाक है। आगे क्या होगा, यह सोचकर ही दिलो-दिमाग सिहर जाता है। भारत की जिस विकासगाथा की चर्चा 1991 से शुरू उदारीकरण के बाद से ही की जा रही थी, वो अब धराशाई हो चुकी है। मोदी सकार भले ही 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने का नारा उछालती रहे। लेकिन यह नारा अब थोथा चना, बाजे घना की स्थिति में पहुंच चुका है। यह सच है कि मोदी की आर्थिक नीतियों के केंद्र में किसान, मजदूर और युवा वर्ग कभी नहीं रहा। उसकी आर्थिक नीतियों के केंद्र में देशी-विदेशी कॉरपोरेट क्षेत्र ही रहा है। लेकिन वही कॉरपोरेट क्षेत्र अब मोदी की संकीर्णता को देखकर देश में निवेश नहीं करना चाहता। जिसको जहां मौका मिल रहा है, वहां भागे जा रहा है। भारतीय कंपनियां अमेरिका में 20.5 अरब डॉलर का निवेश करने जा रही हैं। यह उस 10 अरब डॉलर से अलग है जो गौतम अडाणी ने रिश्वतखोरी के मामले को रफा-दफा करने के लिए अमेरिका में लगाने का वादा किया है। कॉरपोरेट क्षेत्र में कहा जा रहा है जो मोदी सरकार अडाणी को धंधा देने के लिए भाजपा को जबरदस्त चंदा देनेवाले वेदांता समूह तक को गच्चा दे सकती है, उसका क्या भरोसा किया जाए? अब सोमवार का व्योम…
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