शेयर बाज़ार में जबरदस्त निराशा का आलम है। बहुत सारे बड़े-बड़े निवेशकों को लगता है कि अब भारत की विकासगाथा का अंत हो गया है। इसकी तात्कालिक वजह जहां पश्चिम एशिया में चल रही उथल-पुथल और ऊर्जा सुरक्षा पर छाया संकट है, वहीं स्थाई वजह मोदी सरकार की स्वार्थी व सत्ता केंद्रित राजनीति है। देश की सत्ता पर संघ व भाजपा का शिकंजा कसता जा रहा है। मगर अर्थव्यवस्था की हालत चॉक के टुकड़े जैसी भंगुर होती जा रही है। सवाल है कि आगे क्या होगा? ईमानदार जवाब है कि किसी को नहीं पता। जो ताल ठोंककर भविष्य जानने का दावा करते हैं, वे असल में छलिया और महाठग हैं। यह दौर लम्बी सोच का है। इस आशा का है कि भारत की प्राकृतिक व मानव संपदा को कोई ताकत खत्म नहीं कर सकती। कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा। भारत में दुनिया की अर्थव्यवस्था का संकटमोचक बनने की सामर्थ्य है। इस समय छोटे निवेशकों को उन अवसरों को पकड़ने पर ध्यान देना चाहिए, जहां एफआईआई, बैंक व म्यूचुअल फंड जैसे बड़े निवेशक चाहकर भी नहीं पहुंच पाते। पानी और मछली का हाल है। हाथ लगाओ डर जाएगी, बाहर निकालो मर जाएगी। अब तथास्तु में आज की कंपनी…
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