दुनिया में छिड़े युद्ध जैसे बाहरी कारक और देश के भीतर मुद्रास्फीति, चालू खाते व पूंजी खाते जैसे घरेलू कारक यकीनन रुपए के गिरने की वजह बनते हैं। लेकिन हमें इस बार रुपए के लगातार गिरते जाने की वजह को समझने के लिए दूसरे कारकों पर भी गौर करना होगा। ध्यान दें कि जनवरी से दिसंबर 2025 तक दुनिया की छह मुद्राओं की बास्केट के सापेक्ष डॉलर की शक्ति को नापनेवाला डॉलर सूचकांक 108.09 से गिरकर 98.25 पर आ गया। लेकिन इसी दौरान रुपया मजबूत होने के बजाय प्रति डॉलर 85.70 से कमज़ोर होकर 89.91 हो गया। अभी डॉलर महंगा होते-होते 95 रुपए के पार जा चुका है। जनवरी से दिसंबर 2025 तक रुपए की चाल दुनिया के विकसित और उभरते या विकासशील देशों की मुद्राओं से विपरीत दिशा में चली। उस दौरान थाईलैंड की बाट, चीन की युआन, कोरिया की वॉन, ताईवानी डॉलर, ब्राज़ील की रियाल, मेक्सिको की पेसो, ब्रिटेन की पौंड और यूरोप की मुद्रा यूरो, सब की सब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत हुईं। गिरावट में भारतीय रुपए का साथ केवल दो मुद्राओं ने दिया – इंडोनेशिया का रुपैया और वियतनाम का डोंग। लेकिन साल 2025 में वियतनाम का निर्यात करीब 17% और इंडोनेशिया का निर्यात 5.61% बढ़ा है, जबकि पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का माल निर्यात मात्र 0.93% बढ़ा है। अब मंगलवार की दृष्टि…
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