दुनिया में भारत के दो पायदान नीचे गिरकर छठी अर्थव्यवस्था बन जाने पर सरकार के सन्नाटा खींचने का तुक समझ में आता है। वो अप्रिय सच को कभी भी स्वीकार नहीं कर सकती। लेकिन जिस तरह मीडिया का स्वतंत्र व निष्पक्ष कहा जानेवाला हिस्सा भी इस पतन पर एक से एक नायाब बहाने निकालकर सामने लाया है, वो एकदम बेतुका है। लगता है कि वो खुद ही सरकार का अघोषित प्रवक्ता बन गया है। उसका तर्क है कि अगर नई सीरीज़ में जीडीपी का आकार ₹357.14 लाख करोड़ से घटाकर ₹345.47 लाख करोड़ न किया गया होता और डॉलर के बरक्स रुपया कमज़ोर न हुआ होता तो भारत पांचवीं से गिरकर छठी नहीं, बल्कि उठकर चौथी अर्थव्यवस्था बन ही गया होता। इन सरकारी भांटों को बता दें कि आईएमएफ ने भारत के जीडीपी की गणना में डॉलर की विनिमय दर 88.5 रुपए रखी है, जबकि यह दर दिसंबर 2025 से लगातार 90 रुपए से ऊपर चल रही है और वित्त वर्ष 2025-26 के आखिरी दिन 31 मार्च 2026 को 93.48 रुपए थी। खैर, जीडीपी का पुराना आकार ₹357.14 लाख करोड़ और विनिमय दर 88.50 रुपए ही लें, तब भी भारत का जीडीपी 2025-26 में 4.03 ट्रिलियन डॉलर ही निकलता और ब्रिटेन, जापान व जर्मनी हम से ऊपर ही होते। 95 रुपए तक पहुंची वास्तविक विनिमय दर तो कचूमर ही निकाल देती। अब बुधवार की बुद्धि…
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