दुनिया के तमाम देश जीडीपी की गणना इसलिए करते हैं ताकि विकास की माकूल रणनीति बनाई जा सके। पर मोदी सरकार के नेतृत्व में चल रहा भारत शायद दुनिया का इकलौता देश है जहां जीडीपी को प्रचार व भौकाल का साधन बना दिया गया है। विकास का सही डेटा देश के नीति-नियामकों और उद्योग-धंधों को ऐसा आधार देता है जिस पर खड़े होकर वे मांग, निवेश की संभावनाओं और मौद्रिक व आर्थिक नीति का समुचित आकलन कर सकते है। लेकिन अपने यहां इसकी कोई ज़रूरत ही नहीं समझी जाती। सरकार को अर्थव्यवस्था की समस्याओं को सुलझाना नहीं, बल्कि हवाबाज़ी करना है। इससे अलग राष्ट्रीय हित की बात करें तो नीति-नियामकों और उद्योग-धंधों को ही नही, आम लोगों के लिए भी जीडीपी सही स्थिति, उसका सही डेटा जानना व आत्मसात करना काफी महत्वपूर्ण है। तभी वे मौजूदा चुनौतियों से लड़ते हुए भविष्य की तैयारी कर सकते हैं। लेकिन वे सच कहां से देखें? मीडिया का स्वत्रंत बिजनेस मॉडल है। वो चाहे तो नए दौर के हिसाब से इसे विकसित कर सकता है। मगर, उसे शॉर्ट-कट चाहिए तो मध्यकाल की तरह राजा और नवाब की कृपा पर चलनेवाला चारण-भांट बन गया है। वो वही दिखाता और छापता है जो सरकार व सत्ता के माफिक है। वो सच को सात परदों में छिपा डालता है। ऐसे में देश एकदम निर्वासित हो गया है। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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