सरकारी कर्ज गले तक, हमारा गर्दन तक

मोदी सरकार भले ही चार्वाक के नाम पर प्रचारित दर्शन ऋणम कृत्वा, घृतम पीवेत पर चल रही है। लेकिन आम भारतीय कभी ऋण के फंदे में नहीं फंसना चाहता। वो बेहद मजबूरी में ही ऋण लेता है। मगर, सरकारी नीतियों का कमाल देखिए कि मोदीराज में आम भारतीय घरों पर चढ़ा ऋण आज भारत सरकार पर चढ़े ऋण की बराबरी करने जा रहा है। केंद्र में बैठी सरकार जितना कर्ज लेना चाहे ले सकती है क्योंकि उसे चुकाना नहीं होता। यह कर्ज अगली सरकारों के खाते में चला जाता है। भाजपा-नीत मोदी सरकार तो सत्ता से बाहर जाते ही पल्ला झाड़कर छिटक लेगी। लेकिन आम लोगों के पास यह सुविधा नहीं होती। बाप-दादा का कर्ज बेटे-बेटियों और नाती-पोतों तक को चुकाना पड़ता है। वे कॉरपोरेट भी नहीं हैं कि खुद को दीवालिया घोषित कर दें और सरकार के कहने पर बैंक उनके ऋण को बट्टेखाते में डाल दें। आज कितनी दारुण स्थिति है कि जहां भारत सरकार पर चढ़ा ऋण जीडीपी के 56.1% पर पहुंच गया है, वहीं भारतीय घरों पर चढा ऋण जीडीपी का 42.6% चल रहा है। चीन, मलयेशिया व थाईलैंड में अगर लोग भारत से ज्यादा ऋण ले रहे हैं तो एक तो उनके यहां जबरदस्त सामाजिक सुरक्षा है, दूसरे आज जहां भारत की प्रति व्यक्ति आय 2700 डॉलर है, वहीं थाईलैंड की 7800 डॉलर, मलयेशिया की 11,800 डॉलर और चीन की 14,700 डॉलर है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…

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