बोल-वचन नहीं है रेअर अर्थ की चुनौती!

कोई देखता नहीं, कोई पूछता नहीं तो सरकार कुछ भी बोलकर चली जाती है। देश में रेअर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (आरईपीएम) बनाने की ₹7280 करोड़ की नई स्कीम में सात साल के भीतर 6000 टन रेअर अर्थ मैग्नेट प्रतिवर्ष बनाने के लिए पूंजी व प्रोत्साहन दिए जाएंगे। हकीकत यह है कि देश में इस समय सालाना 7000 टन रेअर अर्थ मैग्नेट की खपत होती है। अगर नई स्कीम सफल भी हो गई और साल 2030 तक देश में सालाना 6000 टन मैग्नेट बनने लगे, तब तक दोगुनी (14,000 टन) हो गई मांग का बाकी हिस्सा चीन से आयात करना पड़ेगा। सरकार से यह भी पूछा जाना चाहिए कि 2023 में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में एक सुविधा लगाई गई थी और सरकारी व निजी भागीदारी से एक अन्य संयंत्र भी लगाने की घोषणा हुई थी, जिसमें 2030 तक सालाना 5000 टन रेअर अर्थ मैग्नेट बनाए जाने थे, उसकी अभी क्या स्थिति है? केवल धन आवंटित करने और प्रोत्साहन देने से सब हो जाता तो अप्रैल 2020 में ₹1.91 लाख करोड़ के आवंटन से शुरू की गई प्रोडक्शन लिंक्ड़ इन्सेंटिव (पीएलआई) स्कीम का हश्र 2026 तक आते-आते ऐसा नहीं हो जाता कि बजट में वित्त मंत्री उसका नाम तक नहीं लेतीं। रेअर अर्थ में जापान, दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसे देशों ने सालोंसाल की रिसर्च से टेक्नोलॉज़ी विकसित की है, जबकि भारत निल-बटे-सन्नाटा है। अब शुक्रवार का अभ्यास…

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