देश में सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) का अटका भुगतान बड़ी सरकारी व निजी कंपनियों से दिलवाने के लिए जनवरी 2017 से लागू ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टम या ट्रेड्स (TReDS) की व्यवस्था अपनी सामर्थ्य दिखा चुकी है। लागू होने पहले साल वित्त वर्ष 2017-18 में इस प्लेटफॉर्म से छोटे उद्यमों को ₹950 करोड़ ही मिल सके। लेकिन वित्त वर्ष 2021-22 में यह रकम ₹40,000 करोड़ और वित्त वर्ष 2024-25 मे ₹2.33 लाख करोड़ तक जा पहुंची। हालांकि जहां अटका भुगतान ₹7.34 लाख करोड़ का हो, वहां 32% स्थगित भुगतान ताली बजाने की इजाजत नहीं देता। फिर भी मामा न होने से काना मामा अच्छा। मगर असली दिक्कत यह है कि देश के कॉरपोरेट खरीदार मनबढ़ हो चुके हैं। इनमें भी जिनकी क्रेडिट रेटिंग कमज़ोर हो, बैंक उनसे भुगतान निकलवाने में हिचकिचाते हैं। सरकार खुद ही सिस्टम को ठेंगा दिखा देती है। महाराष्ट्र में राज्य मंत्रिमंडल ने फैसला किया कि राज्य सरकार ठेकेदारों के बकाया ₹70,000 करोड़ के भुगतान के लिए ट्रेड्स का सहारा लेगी। लेकिन जब फैसले में अमल की बात आई तो सरकार ने ही तमाम अडंगे लगा दिए। इससे साफ होता है कि नियम बन जाने के बावजूद सरकार छोटे उद्यमियों के साथ नहीं, बल्कि बड़े खरीदारों से साथ खड़ी है और उसकी नीयत में बुनियादी खोट है। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…
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