भारत के आर्थिक इतिहास का दुखद सच है कि यहां छोटे उद्योग व व्यापार की कभी कद्र नहीं हुई। सरकारी और निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों पर ही सरकार की कृपा बरसती रही। औद्योगिक नीति में पीएलआई जैसी सब्सिडी बड़ी कंपनियों को मिलती रही। इन्हीं नीतियों का नतीजा है कि अक्सर छोटी कंपनियां बाल्यावस्था से प्रौढ़ बनते हुए बड़ी नहीं बनतीं, बल्कि बौनी ही रह जाती हैं। उम्मीद थी कि यह सच्चाई बदल जाएगी। खासकर जनवरी 2017 में ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टम या ट्रेड्स (TReDS) के लागू हो जाने के बाद एमएसएमई इकाइयों को बौना बने रहने के अभिशाप से मुक्ति मिल जानी चाहिए थी। इस सिस्टम के साफ-साफ फायदे नज़र भी आए। जिन इकाइयों ने यह सिस्टम अंगीकार किया, उनकी बिक्री औसतन 8% और स्थाई आस्तियां 4% सालाना बढ़ने लगीं। उन्हें बैंक ऋण पर आधा प्रतिशत कम ब्याज देना पड़ा। लेकिन इतने फायदों के बावजूद न जाने क्यों एमएसएमई इकाइयां ट्रेड्स प्लेटफॉर्म को जमकर नहीं अपना रहीं। मार्च 2025 तक केवल 1.35 लाख एमएसएमई ट्रेड्स प्लेटफॉर्म पर पंजीकृत हैं जो सरकार के यहां दर्ज कुल 1.75 करोड़ एमएसएमई का 1% भी नहीं है। अभी ट्रेड्स पर 8000 बड़ी कंपनियां आ चुकी हैं। लेकिन इनमें से केवल 2500 ही सक्रिय हैं। बाकी सभी मृतप्राय हैं। आखिर ऐसा क्यो? अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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