बड़ी सरकारी और निजी कंपनियों द्वारा एमएसएमई इकाइयों का भुगतान लटकाने की समस्या सुलझाने के लिए मनमोहन सिंह सरकार ने साल 2011 में फैक्टरिंग रेग्युलेशन एक्ट बनाया था। यह सही दिशा में उठा कदम था और इसने एमएसएमई की फाइनेंसिंग व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए एक कानूनी फ्रेमवर्क बना दिया। फिर भी समस्या सुलझी नहीं। साल 2014 में रिजर्व बैंक ने इस बाबत एक कॉन्सेप्ट पेपर पेश किया, जिसके आधार पर आज का ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टम या ट्रेड्स (TReDS) बना है जिसका उल्लेख वित्त मंत्री निर्मला सीतरमण ने इस बार के बजट में पांच बार किया है। दिक्कत यह हुई कि रिजर्व बैंक का कॉन्सेप्ट पेपर आने के तीन साल बाद जनवरी 2017 में ट्रेड्स पर अमल किया जा सका। उम्मीद थी कि अब ऐसा इलेक्ट्रॉनिक मार्केटप्लेस बन जाएगा, जहां एमएसएमई की इनवॉयस डिस्काउंटिंग की समस्या हल हो जाएगी। लेकिन इसे कथनी-करनी का अंतर कहें, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी कहें या नीयत का अभाव, छोटे-छोटे उद्यमों की परेशानी जारी रही। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2021 के अंत तक एमएसएमई का अटका भुगतान ₹10.7 लाख करोड़ तक पहुंच गया। छोटी इकाइयां धंधा हाथ से निकलने के डर के चलते बड़े खरीदारों से सीध भिड़ नहीं सकती। बैंकों ने भी इनवॉयस डिस्काउंटिग से उनकी मदद नहीं की। अब मंगलवार की दृष्टि…
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