एमएसएमई क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, चाहे वो निर्यात हो या रोज़गार सृजन। लेकिन देश के सत्ताशीर्ष पर बारह सालों से बैठा शक्स इस रीढ़ को ही तोड़ने में लगा है। यह कितना बड़ा छलिया है कि सत्ता संभालने के पहले दिन से खुद को इस क्षेत्र को रहनुमा बताता रहा है। इसके झूठ को मीडिया का भोंपू इतना बढ़ा देता है कि उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम हर कोने से त्राहिमाम करते इस क्षेत्र की पुकार किसी को सुनाई नहीं देती। मालूम हो कि एमएसएमई या सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों का दायरा हस्तशिल्प, लेदर-फुटवियर, टेक्सटाइल, टी, कॉफी, मसालों, समुद्री उत्पाद, फर्नीचर, खिलौनों, खेलकूद के सामानों, जेम्स-जेवेलरी व छोटी-मोटी मशीनरी बनाने तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र असल में सरकारी से लेकर निजी क्षेत्र की बड़ी-बड़ी कंपनियों को माल बनाकर सप्लाई करता है। ये कंपनियां इन उद्यमों का भुगतान 60 से 90 दिनों या इससे भी ज्यादा लटका देती हैं। बड़ी कंपनियों को तो दो-तीन महीनों के लिए मुफ्त माल मिल जाता है, जबकि एमएसएमई वेतन व किराया देने के लिए तरस जाते है। उन्हें बाज़ार से महंगा धन उठाना पड़ता है। सरकार का क्या रवैया रहता है, इसे इससे समझा जा सकता है कि पिछले तीन सालों से एमएसएमई उधारकर्ताओं के लिए बजट में आवंटित ₹9000 करोड़ के इमरजेंसी फंड से किसी भी साल एक धेला तक खर्च नहीं हुआ है। अब सोमवार का व्योम…
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