यह वाकई बड़े अचम्भे की बात है। वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में नॉमिनल जीडीपी पुरानी सीरीज में ₹86,05,365 करोड़ था, जबकि रीयल जीडीपी ₹47,88,623 करोड़ था। आखिर डेरिवेटिव या निकाला गया रीयल जीडीपी बाज़ार मूल्य के नॉमिनल जीडीपी से 44.35% कम क्यों? मुद्रास्फीति को बेअसर करने का यह कैसा डिफ्लेटर था जिसने गुब्बारे की 44.35% हवा निकाल दी थी? सरकारी अर्थशास्त्रियों व आर्थिक विश्लेषकों की जमात इतने बड़े अंतर का रहस्य खोलने के बजाय तंजऔरऔर भी

मोदी सरकार जीडीपी को चमकाने के लिए सालों-साल से बड़े योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही है। जीडीपी की गणना का आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 करना तय था। इसलिए उसने 2022-23 का जीडीपी जितना कम किया जा सकता था, उतना कम किया ताकि उसके आधार पर आगे अधिक वृद्धि दर दिखाई जा सके। वित्त वर्ष 2022-23 में नॉमिनल जीडीपी शुरू में ₹2,72,40,712 करोड़ आंका गया। फिर इसे घटाकर ₹2,68,90,473 करोड़ किया गया। फरवरी 2026 मेंऔरऔर भी

बाज़ार में मूल्य समय के साथ बाद में घट-बढ़ सकते हैं। लेकिन एक बार बाज़ार के किसी मूल्य पर समय का ठप्पा लग गया तो उसे बाद की किसी तारीख में संशोधित करके घटाया-बढ़ाया नहीं जा सकता। मान लीजिए कि आपने जून 2025 में एक किलो घी 500 रुपए में खरीदा। जून 2026 में उसी घी के दाम 550 रुपए हो गए तो 10% की बढ़ोतरी हो गई। ऐसा हो नहीं सकता कि घी का जो बाज़ारऔरऔर भी

किन्ने कहा किन्ने कहा, बब्बन हज्जाम ने कहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की आलोचनाओं की ठीकरा नाराज़ फूफाओं पर फोड़ने में लगे हैं। लेकिन इससे पहले ही मोदी सरकार में जुलाई 2017 से जुलाई 2019 तक दो साल वित्त मंत्रालय में आर्थिक मामलात से लेकर वित्त सचिव जैसे शीर्ष पदों पर रहे सुभाष चंद्र गर्ग ने बब्बन हज्जाम बनकर उनकी ऐसी पोल-पट्टी खोली कि हंगामा बच गया। मोदी सरकार का दिखाने का अंतिम दांत जीडीपी काऔरऔर भी

देश के कम से कम 12.1 करोड़ युवा निठल्ले बैठे हैं। 81.35 करोड़ लोग हर महीने सरकार से मिलनेवाले पांच किलो मुफ्त राशन के मोहताज़ हैं। 9.45 करोड़ स्वाभिमानी किसानों की कमर ऐसी टूटी है कि सरकार से साल भर में 6000 रुपल्ली की सम्मान-निधि पाकर लाभार्थी बन गए। वित्त मंत्री सीतारमण विदेश जाकर भारतीय मध्यवर्ग को बेच रही हैं। कुछ दिन पहले फ्रांस में उन्होंने बताया कि भारतीय मध्यवर्ग 1995 से औसतन हर साल 6.3% बढ़औरऔर भी

देश में इस वक्त 12.1 करोड़ युवा ऐसे हैं जो न तो पढ़ रहे हैं और न ही किसी रोज़गार या ट्रेनिंग में लगे हैं। 2012 से 2024 तक युवा बेरोजगारों की संख्या तीन गुनी हो गई। जो आज तक दुनिया की किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था में नहीं हुआ, वो भारत में हो चुका है। यहां 2020 से 2024 के बीच उद्योग-धधों से निकलकर आठ करोड़ मजदूर वापस खेती-किसानी में लौट गए। भारत की यह दारुण हकीकतऔरऔर भी

मोदी सरकार एक तरफ स्वदेशी, आत्मनिर्भर भारत और मेक-इन इंडिया का राग अलाप रही है, दूसरी तरफ स्थिति यह है कि देश का 30.8% औद्योगिक माल चीन से बनकर आ रहा है। वित्त मंत्रालय ने कई साल से सीमावर्ती देशों की कंपनियों पर हमारे सरकारी टेंडरों में भाग लेने पर बंदिशें लगा रखी हैं। लेकिन अचानक 24 जून को मंत्रालय ने आदेश जारी करके भारत में फैक्ट्रियां चला रही चीन की चार कंपनियों को ऐसी बंदिशों सेऔरऔर भी

इसे देश की आर्थिक आपदा कहें या अर्थव्यवस्था में बढ़ रहा असंतुलन। इसका मूल आधार है मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का ठहराव और जीडीपी में उसके योगदान का घटते जाना। विश्व बैंक के डेटा के मुताबिक 2015 में हमारे जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 16% हुआ करता था। यह 2025 तक घटकर 13% रह गया है। इसी दौरान इंडोनेशिया के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा बढ़कर 19%, मलयेशिया में 23% और वियतनाम में 24% हो गया। बता दें किऔरऔर भी

रुपए का गिरना, रोज़गार का घटना, भ्रष्टाचार का बढ़ना, अमीरों का और ज्यादा अमीर और गरीबों का और ज्यादा गरीब होते जाना। यह सारा कुछ हमारी अर्थव्यवस्था में पनपते भयंकर असंतुलन के लक्षण हैं। फिर भी अर्थव्यवस्था की बीमारी अभी असाध्य नहीं हुई है। इस बीमारी के स्वरूप को ऊपरी तौर पर तीन विकासक्रमों से समझा जा सकता है। एक, महंगे फोन और कंप्यूटर बेचनेवाली कंपनी एप्पल इंडिया की आय रोजमर्रा के आम उपभोक्ता सामान बेचनेवाली देशऔरऔर भी

सरकारी दावों और मंत्रियों-सलाहकारों के मंत्रों से इतर देश में रोज़गार की असल स्थिति क्या है? लगभग 2.80 करोड़ बेरोज़गार शिक्षित युवा नौकरियों की तलाश में लगे हैं, जबकि करीब 10 करोड़ लोगों ने थककर नौकरी की तलाश ही बंद कर दी है जिसमें से ज्यादातर महिलाएं हैं। रोज़गार पर विश्वसनीय डेटा देनेवाली इकलौती निजी संस्था सीएमआईई के मुताबिक भारत में मार्च 2017 के अंत तक 15 साल से 64 साल की कामकाज़ी उम्र के 42.7% लोगोंऔरऔर भी