शॉर्ट-सेलिंग का सीधा-सा फंडा है कि ब्रोकर के पास मार्जिन मनी रखकर आप उन शेयरों को निश्चित भाव पर बेच देते हो जो आपके पास नहीं होते। ये शेयर असल में ब्रोकर अपने खाते से उसी भाव पर सामनेवाले को दे देता है और आपके ऊपर उधार चढ़ा देता है। आपको भरोसा रहता है कि संबंधित शेयर का भाव आगे गिरेगा। अगर ऐसा हुआ तो आप सस्ते भाव पर खरीदकर वो शेयर ब्रोकर को लौटा देते हो।औरऔर भी

शॉर्ट-सेलिंग केवल उन्हीं सूचकांकों व स्टॉक्स में की जा सकती है जो डेरिवेटिव सेगमेंट में शामिल हैं। ऐसे तीन सूचकांक हैं निफ्टी-50, निफ्टी बैंक और निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज़। वहीं, इस सेगमेंट में शामिल स्टॉक्स की संख्या 160 है। एनएसई की साइट से आपको इनके लॉट साइज़ की जानकारी मिल जाएगी। लेकिन शॉर्ट-सेलिंग में सबसे बड़ी उलझन मार्जिन की है जिसकी पूरी जानकारी आपको आपका ब्रोकर ही दे सकता है। मार्जिन से कई गुना मूल्य के सौदे आपऔरऔर भी

प्रोफेशनल ट्रेडरों की जीविका ही नहीं, सारा ऐशो-आराम शेयर बाज़ार पर टिका है। वे बाज़ार के बढ़ने पर कमाते हैं और गिरने पर भी। अनिश्चितता को नाथना उन्हें बखूबी आता है। बाज़ार बढ़ता ही जा रहा है तो वे स्टॉक्स और सूचकांकों में लॉन्ग यानी खरीदने के सौदों से कमाते हैं। लेकिन इस वक्त दुनिया के साथ-साथ भारत में भी आशंका गहराती जा रही है कि शेयर बाज़ार का बुलबुला कभी भी फट सकता है। ऐसा हुआऔरऔर भी

कोई सिर उठाए शेयर बाज़ार में टिप्स या इंट्यूशन के दम पर ट्रेड करने आ जाए तो वह जेब खाली करके ही लौटेगा। यहां तो वही रिटेल ट्रेडर कामयाब होते हैं जो प्रोफेशनल की तरह ट्रेड करते हैं अपना सिस्टम बनाकर। यह सिस्टम किसी की नकल नहीं होता। टेक्निकल एनालिसिस का आधार। अधिकतम चार-पांच इंडिकेटर का इस्तेमाल। बाज़ार में सक्रिय खिलाड़ियों का पूरा आकलन। भाव कहां और क्यों रुख बदल सकते हैं, कहां पर एंट्री और कहांऔरऔर भी

जो लोग कहीं नौकरी या सुबह से शाम तक काम-धंधा कर रहे हैं, उनके लिए इंट्रा-डे ट्रेडिंग करना व्यावहारिक नहीं है। उन्हें तो स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेड ही करना चाहिए। स्विंग ट्रेड पांच-सात या अधिकतम दस दिन के लिए होता है। इसमें सौदा वहां पकड़ते हैं जहां से कोई स्टॉक दिशा बदल सकता है। मोमेंटम ट्रेड भावों की दिशा में या ब्रेकआउट की संभावना को देखते हुए किया जाता है और इसकी अवधि 10-20 दिन कीऔरऔर भी

शायद आपको नहीं पता होगा कि संस्थाओं को भारत में इंट्रा-डे ट्रेडिंग करने की इजाज़त नहीं है। इसमें केवल व्यक्तिगत निवेशक ही भाग ले सकते हैं। यह कमाल की बात है क्योंकि शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में सबसे ज्यादा रिस्क है। व्यक्तिगत निवेशक सबसे ज्यादा भोले व अनजान होते हैं। फिर भी हमारी सरकार की तरफ से पूंजी बाज़ार के नियमन के लिए बनाई गई संस्था, सेबी ने केवल और केवल उन्हें ही शेयर बाज़ार के सबसेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की इंट्रा-डे ट्रेडिंग में कूदनवाले पांच तरह के लोग होते हैं। एक जो बहुत सोच-समझकर इसे अपना पेशा बनाते हैं। टेक्निकल से लेकर फंडामेंटल एनालिसिस तक सीखते हैं। ऐसे प्रोफेशनल ट्रेडर अपने स्वभाव व तासीर के माफिक सिस्टम विकसित करते हैं और बराबर अपनी पूंजी बचाते हुए उसे बढ़ाते रहते हैं। दूसरे हैं एचएनआई या हाई नेटवर्थ इंडीविजुअल। ये भी हमेशा अपनी पूंजी बचाकर चलते हैं। तीसरे जो फटाफट नोट बनाने के चक्कर में बाज़ारऔरऔर भी

इंट्रा-डे ट्रेडर पहले भी शेयर बाज़ार में भरे पड़े थे। आज भी उनकी भरमार है। पिछले एक साल में जो डेढ़ करोड़ नए निवेशक/ट्रेडर अपने यहां बाज़ार से जुड़े हैं, उनमें से ज्यादातर इंट्रा-डे ट्रेडिंग या बहुत हुआ तो बीटीएसटी (आज खरीदो, कल बेचो) सौदे करते होंगे। लेकिन उनको होश नहीं कि हर टिक पर बढ़ते-गिरते भावों की भंवर में कूदकर मुनाफा कमाना कोई पार्ट-टाइम जॉब नहीं। ये दिन की पूरी ट्रेडिंग के दौरान बराबर अलर्ट रहनेऔरऔर भी

उठती ज्वाला और गिरते चाकू को पकड़ने की कोशिश कभी ना करें। शेयर बाज़ार में ऐसा एडवेंचर दिखाना उसी तरह है कि आप शेर से लड़ जाएं और शेर आपको खा जाए। इसलिए ट्रेडिंग में हमेशा ‘2% और 6% के अकाट्य मंत्र’ का पालन करना ज़रूरी है। हर सौदे में पहले से स्टॉप-लॉस लगाकर चलें। एक सौदे में 2% से ज्यादा घाटा नहीं और महीने में कुल 6% का घाटा लग गया तो पूरे महीने ट्रेडिंग सेऔरऔर भी

हम रिटेल ट्रेडरों की कुछ सीमाएं हैं जिन्हें भलीभांति समझ लेना चाहिए। मसलन, हम कभी खबरों पर ट्रेड नहीं कर सकते। कारण, खबरें जब तक विभिन्न सूचना माध्यमों से हम तक पहुंचती हैं, तब तक बाज़ार उन्हें जज़्ब कर चुका होता है। कंपनियों के नतीजे घोषित होने से पहले ऑपरेटरों तक पहुंच चुके होते हैं। इनमें खुद कंपनियों के प्रवर्तक तक शामिल होते हैं। इनसाइडर ट्रेडिंग भले ही अपराध हो। लेकिन ज़मीनी हकीकत है कि यह अपराधऔरऔर भी