शेयर बाज़ार ही नहीं, समूचे वित्तीय बाज़ार में रिटेल ट्रेडरों के लिए ट्रेडिंग के रिस्क को संभालने का सर्वमान्य तरीका है, किसी एक सौदे में 2% से ज्यादा नुकसान न उठाया जाए और महीने में अगर नुकसान 6% तक पहुंच जाए तो उस महीने की ट्रेडिंग फौरन रोक दी जाए। दूसरे शब्दों में आमतौर पर खरीदने के हर सौदे में डिमांड-ज़ोन के निचले स्तर से 2% नीचे का स्टॉप-लॉस लगाया जा  सकता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में रिस्क को संभालने का सामान्य तरीका है पोजिशन साइज़िंग। मान लीजिए, ट्रेडिग के लिए एक लाख रुपए रखे हैं तो उसे बीस हिस्सों में बांट लें। एक हिस्सा 5000 रुपए का। कुल बीस ट्रेड कर सकते है। कोई सौदा उल्टा पड़ा तो 5000 डूबेंगे, बाकी 95000 रुपए बचे रहेंगे। लेकिन इस तरीके में बहुतेरी खामियां हैं। फिर, यह तरीका केवल अप-ट्रेन्ड वाले स्टॉक्स में अपनाया जा सकता है। अब मंगलवार की दृष्टि…और भीऔर भी

दुनिया से लेकर देश तक की अर्थव्यवस्था पर अनिश्चितता मंडरा रही है। इसने शेयर बाज़ार में निवेश व ट्रेडिंग का रिस्क पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा दिया है। ऐसे में अगर कोई ट्रेडर रिस्क को संभालने का पुख्ता इंतज़ाम नहीं करता, वह तगड़ी चोट खा सकता है। स्टॉप-लॉस और पोजिशन साइजिंग ट्रेडिंग के रिस्क को संभालने के दो खास तरीके हैं। लेकिन अहम सवाल यह है कि इन्हें व्यवहार में कैसे अपनाया जाए? अब सोमवार का व्योम…और भीऔर भी

दिशाहीन बाज़ार में फिलहाल इंट्रा-डे ट्रेडर ही चल रहे हैं। इनमें भी खासतौर पर माइक्रो-ट्रेन्ड ट्रेडर जो ऐसे ट्रेडर हैं जो 59 मिनट 59 सेकेंड से ज्यादा ट्रेड नहीं करते। सौदे एक घंटे के भीतर काट देते हैं। वहीं, इंट्रा-डे ट्रेडर दिन के दिन में सौदे काटते हैं। उनके सौदों का सारा हिसाब-किताब दिन की ट्रेडिंग खत्म होने के साथ ही बराबर हो जाता है। न ऊधव का लेना, न माधव का देना। अब शुक्रवार का अभ्यास…और भीऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार की दशा-दिशा के सबसे बड़े निर्धारक हैं विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई)। एफआईआई भी इन्हें कहा जाता है। बजट के बाद इन्होंने अभी तक रुख साफ नहीं किया है। जब तक इनका रुख स्पष्ट नहीं होता, तब तक बाज़ार यूं ही दिशाहीन रहेगा। ये संस्थाएं निवेश की निश्चित रकम हर तिमाही के लिए आवंटित कर देती हैं। फिर उसके मुताबिक अनुशासन में बंधकर बाज़ार में धन डालती या उससे निकालती हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार धीरे-धीरे स्थिर हो रहा है। लेकिन अब भी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है। शॉर्ट करनेवाले अपनी पोजिशन कवर कर रहे हैं तो वह थोड़ा-थोड़ा करके बढ़ रहा है। इस मायने में कहां जाए तो शॉर्ट से कमानेवाले या मंदडिए शेयर बाज़ार को एक हद तक गिरने पर उठाने लगते हैं। वैसे, अभी तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने साफ नजरिया नहीं बनाया है। वे किसी दिन खरीदते तो किसी दिन बेचते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…और भीऔर भी

जहां हर पल लाखों लोगों की भावनाओं का ज्वार चलता हो, वहां तर्क का बह जाना निश्चित है। इसीलिए शेयर बाज़ार में बड़ी-बड़ी गणनाएं अक्सर फेल हो जाया करती हैं। फिर भी एक मोटा-सा नियम हमेशा काम करता है। अगर किसी भी वजह से ज्यादा धन किसी स्टॉक का पीछा करेगा तो लिवाली से उसका बढ़ना तय है। उसके बाद उसमें बिकवाली भी चलेगी। कुशल ट्रेडर लिवाली व बिकवाली के बीच कमाते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…और भीऔर भी

इस बार का बजट न तो सरकार के घाटा प्रबंधन और न ही कृषि या उद्योग के लिए अच्छा रहा है। जबरन सच्चाई से आंखें चुराई गई हैं। फिर भी हमारा शेयर बाज़ार शुरुआती झटका खाने के बाद पहले जैसा कुलांचे मारने लगा है। विदेशी संस्थाओं ने कुछ दिन बेचा, मगर फिर वे भी खरीदारी पर उतर आए। सोचने की बात है कि आखिर बाज़ार की इस कुतर्की चाल की वजह क्या है? अब सोमवार का व्योम…और भीऔर भी

आपको याद होगा कि सरकार ने कुछ महीने पहले टैक्स कटौती से कॉरपोरेट क्षेत्र को 1.45 लाख करोड़ रुपए का तोहफा दिया था। लेकिन आप नहीं जानते कि केंद्र सरकार ने निजी व सरकारी कंपनियों और मनरेगा जैसी सामाजिक स्कीमों व राज्य सरकारों का लगभग 3 लाख करोड़ रुपए का बकाया दबा रखा है। वो यह बकाया चुका देती तो अर्थव्यवस्था में जान आ जाती। लेकिन वह तो एलआईसी से कमाना चाहती है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

कमज़ोर अर्थव्यस्था का असर केंद्र के टैक्स-संग्रह पर दिख रहा है। चालू वित्त वर्ष 2019-120 में उसका निवल टैक्स-संग्रह लक्ष्य से 1.13 लाख करोड़ रुपए कम है। इसलिए नए वित्त वर्ष का लक्ष्य पूरा होना मुश्किल है। शायद इसीलिए वित्तमंत्री ने सरकारी कंपनियां बेचकर 2.1 लाख करोड़ रुपए हासिल करने का मंसूबा बांधा है, जबकि चालू वित्त वर्ष के 1.05 लाख करोड़ के लक्ष्य में अब तक मात्र 18,094 करोड़ जुटे हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…और भीऔर भी