आर्थिक गतिविधियां कोरोना संकट से पहलेवाली स्थिति में कब लौटेंगी, नहीं पाता। हालांकि शेयर बाज़ार अब भी मानकर बैठा है कि सब ठीक होने जा रहा है। सवाल उठता है कि बाज़ार की तेज़ी सस्ते धन के प्रवाह और सटोरिया पूंजी की चहक के दम पर आई है या किसी ठोस आशावाद की बदौलत? ऊपर-ऊपर सब सुनहरा है। कोरोना से निपटने के वैश्विक वित्तीय पैकेज का धन भी भारत, चीन व इंडोनिशिया के बाज़ारों की तरफ बहऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था के उबरने की कोई सूरत नहीं दिख रही। लेकिन शेयर बाज़ार का मूल्यांकन किसी दम्भी राजा के गुमान की तरह फूले जा रहा है। आखिर कब उसका गुमान टूटेगा, गुब्बारा फूटेगा? लॉकडाउन में घर-बैठे लोग साल भर से बाज़ार में कूदते रहे हैं और फिर कूदने को तत्पर हैं। देश 1992 से लेकर 2008 तक हर्षद मेहता व केतन पारिख से लेकर हेजफंड और सब-प्राइम संकट से निकले भूचाल देख चुका है। लेकिन इस बार कबऔरऔर भी

हम सामाजिक ही नहीं, आर्थिक व वित्तीय जीवन के बड़े विचित्र दौर से गुज़र रहे हैं। विश्व अर्थव्यवस्था लस्त-पस्त है। सस्ती ब्याज दरों की चादर के नीचे मुद्रास्फीति का अजगर कुलकुला रहा है। आर्थिक विषमता सामाजिक अशांति का बारूद सुलगाए पड़ी है। कोरोना की दूसरी लहर ने बनती संभावनाओं के सारे समीकरण तोड़ डाले हैं। देश के भीतर अंधेर नगरी, चौपट राजा का हाल है। यहां कोरोना वैक्सीन की किल्लत है, लेकिन सत्ताशीर्ष पर बैठे लोग नऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की गली भयंकर रिस्क से भरी है। इस हकीकत को कभी नकारना नहीं चाहिए। यहां एक डिग्री ज्यादा रिस्क तभी लें, जब कम के कम दो डिग्री रिवॉर्ड मिलने की संभावना हो। जानकार मानते हैं कि मौजूदा स्थिति में बाज़ार में कोई गुब्बारा नहीं है। बहुत हुआ तो सेंसेक्स और निफ्टी 20% तक गिर सकते हैं। लेकिन इसे करेक्शन कहा जाएगा। साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद जिस तरह अमेरिका से लेकर यूरोप वऔरऔर भी

हमेशा याद रखें। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग ‘ज़ीरो-सम गेम’ है। किसी का नुकसान, दूसरे का फायदा। यहां पक्का कुछ नहीं, सिर्फ और सिर्फ प्रायिकता चलती है। लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का। मोटा-सा नियम कि जिस स्टॉक को खरीदने की आतुरता ज्यादा, वो बढ़ेगा और जिसे बेचने की व्यग्रता ज्यादा, वो गिरेगा। यह भी ध्यान रहे कि देशी-विदेशी संस्थाओं की खरीद या बिकवाली से ही शेयरों के भाव पर असर पड़ता है। प्रोफेशनल ट्रेडर यही पकड़नेऔरऔर भी

करीब डेढ़ महीने से शेयर बाज़ार पर छाया उन्माद थमता दिख रहा है। 16 फरवरी को निफ्टी ने 15,431.75 का शिखर पकड़ा था। तब से उसकी हालत लस्टम-पस्टम है। कभी इस बहाने तो कभी उस बहाने मुनाफावसूली बाज़ार को दबा ले जाती है। सुबह खरीदकर उसी शाम या अगली शाम बेचकर मुनाफा कमा लेने की अंधी चाल गच्चा देने लगी है। अब तेज़ी के उन्माद में बाज़ार के कूदे नए-नवेले ट्रेडरों को सोचना पड़ रहा है। क्याऔरऔर भी

साल भर से चल रहे कोरोनाकाल में बहुतों की नौकरी गई, बहुतों के धंधे बैठ गए। डूबती अर्थव्यवस्था में ना तो नौकरी के नए अवसर मिले और ना ही धंधे का स्कोप दिखा। बहुतों को लगा कि क्यों ना अब तक बचाए गए धन से ही धन बनाया जाए। सो, शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में कूद पड़े। इधर 20-25 साल के नौजवानों को भी बाज़ार का चस्का लग गया। बाज़ार बढ़ रहा है तो मौजा ही मौजा।औरऔर भी

प्रोफेशनल ट्रेडरों ने इंट्रा-डे सौदों संबंधी मार्जिन सेबी द्वारा घटाई जा रही सीमा की नई काट निकाल ली है। वे कई लॉट नहीं, बल्कि स्वीकृत लॉट के ही कई-कई सौदे करने लगे हैं। मसलन, बहुत से ट्रेडर प्रतिदिन घंटे-घंटे भर के सौदे करने लगे हैं। जैसे ही 59 मिनट 59 सेंकेंड हुए, घाटा हो या फायदा, वे सौदा काटकर निकल जाते हैं। इस तरह स्वीकृत लॉट का मार्जिन देकर दिन में 5-6 सौदे कर डालते हैं। इसेऔरऔर भी

इंट्रा-डे ट्रेडिंग की इजाज़त बैंकों या संस्थाओं को नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि यहां रिटेल ट्रेडरों के लिए खुला खेल फरुखाबादी है। दरअसल, इंट्रा-डे में प्रोफेशनल ट्रेडरों की भरमार हैं। ऐसे मजे हुए दक्ष ट्रेडर जो शेयर बाज़ार के इस सेगमेंट में ट्रेड की बदौलत अपना घर-परिवार चलाते हैं। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग ही उनका बिजनेस है। मार्जिन पर सेबी के कसते जा रहे नियम से यकीकन उन्हें परेशानी होगी। लेकिन पुरानी कहावत है किऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में इंट्रा-डे ट्रेडिंग की इजाज़त केवल रिटेल निवेशकों/ट्रेडरों को है। संस्थाएं/बैंक दिन के दिन में निपटाने वाले ऐसे सौदे नहीं कर सकते। यह सेबी का नियम है। व्यवहार में क्या होगा, पता नहीं। सितंबर 2020 तक रिटेल ट्रेडर ब्रोकर पर रखे मार्जिन का चार गुना ट्रेड कर सकते थे। पहली मार्च से यह सीमा दो-गुना रह गई। जून से यह 1.33 गुना बच जाएगी। फिर, सितंबर 2021 से महज एक गुना। मतलब, इंट्रा-डे में रिटेलऔरऔर भी