सृजनात्मक विनाश और विनाशकारी सृजन का सिलसिला अटूट है। जंगल की आग के बाद पहले से ज्यादा बलवान नए अंकुर फूटते हैं। नई तकनीक पुरानी को ले बीतती है। शिव सृष्टि और समाज के इसी सतत विनाश और सृजन के प्रतीक हैं।और भीऔर भी

मां के गर्भ में खास वक्त तक पता नहीं चलता कि हम पुरुष बनेंगे या स्त्री। उसी तरह किसी संगठन में अल्प विकसित अवस्था तक हमारा खेमा तय नहीं होता। पर हैसियत बनते ही हम पक्षधर बन जाते हैं।और भीऔर भी

नैतिकता की दुहाई कमजोर लोग देते हैं। धर्म, समाज व राजनीति के ठेकेदारों के लिए यह लोगों को भरमाने का एक जरिया है जिसका नाम जपते हुए वे खुद जघन्य से जघन्य काम किए जाते हैं।और भीऔर भी