यह नियम मन में कहीं गहरे बैठा लीजिए कि वित्तीय बाज़ार में जिन ट्रेडरों का ध्यान केवल नोट कमाने पर रहता है, वे अक्सर नोट लुटाते और अपना लक्ष्य कभी हासिल नहीं कर पाते। वहीं ट्रेडिंग की राह की बारूदी सुरंगों का बराबर ध्यान रखनेवाले ट्रेडर अक्सर नोट बनाते और अपना लक्ष्य पा लेते हैं। वैसे, बाज़ार को दोनों ही तरह के ट्रेडर चाहिए क्योंकि एक गंवाएगा, तभी तो दूसरा कमाएगा। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

जब हम वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग की तरफ लपकते हैं तो बस इतना दिखता है कि वहां धन ही धन है। न बॉस, न ऑफिस जाने का झंझट। कंप्यूटर, लैपटॉप या स्मार्टफोन चालू करो। बाज़ार देखो। सौदे करो और नोट बनाते जाओ। हम यह नहीं देख पाते कि नोट तक पहुंचने की राह में कितनी बारूदी सुरंगें बिछी हुई हैं जो हमारे बैंक खाते से लेकर आत्मविश्वास तक के परखच्चे उड़ा सकती हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

कंपनी जिस उद्योग या सेवा में सक्रिय है, उससे उसका स्वभाव तय होता है। जैसे मेटल, दवा, मीडिया, सीमेंट या एफएमसीजी कंपनियों की तुलना अपने उद्योग के भीतर की जा सकती है। लेकिन एक ही उद्योग के स्टॉक्स का चरित्र भिन्न हो सकता है। ट्रेडिंग के लिए हमें स्टॉक के खास चरित्र को समझना होता है जो इस बात से तय होता है कि उसमें किस तरह के निवेशक/ट्रेडर सक्रिय हैं। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

स्ट्राइक रेट के बजाय हमें रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात को तवज्जो देनी चाहिए। मान लीजिए कि कोई ट्रेडिंग सेवा 3:1 का रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात लेकर चलती है, यानी वो ऐसे स्टॉक्स चुनती है जो बढ़े तो 6% बढ़ सकते हैं और गिरे तो 2% पर निकल जाना होगा। दस में से ऐसे छह सौदे गलत निकले तो घाटा 12% होगा, जबकि बाकी चार सही सौदे 24% देकर जाएंगे। यानी, 40% स्ट्राइक रेट पर भी 12% फायदा। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

जब भी हम ट्रेडिंग की कोई सेवा लेते हैं तो पहला सवाल यही पूछते हैं कि उसके सही होने की दर या स्ट्राइक रेट क्या है। लेकिन किसी समझदार ट्रेडर के लिए यह सवाल एकदम बेमानी है। दरअसल, यह ब्रोकरेज फर्मों के एनालिस्टों का मानदंड है क्योंकि इससे वे अपने को तीसमार-खां साबित करते हैं। इसके लिए वे घाटेवाले ट्रेड को लंबा खींचते और मुनाफेवाले ट्रेड को बीच में ही काट देते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

पांच बार सिक्का उछालने पर टेल निकला तो हमें लगता है कि छठीं बार हेड आना पक्का है। हमें अहसास नहीं कि हेड या टेल आने की प्रायिकता हमेशा 50% ही रहेगी, भले ही हज़ार क्या, लाख बार सिक्का उछाल लें। सहजबोध की यही गलती हम ट्रेडिंग में करते हैं। कई बार स्टॉस-लॉस लगता जाए तो मान बैठते हैं कि अगली बार फायदा ही होगा। यह कतई यथार्थपरक और तर्कसंगत सोच नहीं है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

हर कोई फटाफट नोट बनाना चाहता है। इसलिए बहुतेरे लोग अधीर होकर शेयर बाजार की तरफ दौड़ते हैं। ट्रेडिंग से जमकर कमाना चाहते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि ट्रेडिंग हर किसी के लिए नहीं है। इसके लिए शांत मन, साफ समझ और तगड़े अनुशासन की ज़रूरत होती है। अस्थिर मन, सुनी-सुनाई बातों या टिप्स के भीगे भागने और झटके में फैसले लेनेवाले यहां लंबे समय तक नहीं टिक पाते। अब गहते हैं मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

बाज़ार हमसे स्वतंत्र है। वो हमारे पहले था और बाद में भी रहेगा। उसकी चाल और स्वरूप के विकसित होने का अपना ढर्रा है। हमें उसके साथ लयताल बैठानी है। तभी हम वहां से कमा सकते हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि हम तारीख के हिसाब से पूरा रजिस्टर बनाएं कि कोई ट्रेड चुना तो क्यों चुना और उससे कब व क्यों निकले। अपने ही अनुभव की रौशनी में खुद सीखते जाना है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

ट्रेडिंग में एक और मनोविज्ञान बड़ा आम है। दांव अच्छा चल जाए तो अपना बखान और गलत पड़ जाए तो बाज़ार का दोष। गिनाने लगते हैं कि ऑपरेटर लोग बाज़ार में घुसे हुए हैं और बाज़ार को जहां जाना चाहिए, वहां से उलटी दिशा में ले जाते हैं। कहावत है कि नाच न आवै, आंगन टेढ़ा। बाज़ार में ऑपरेटर, समझदार निवेशक और भांति-भांति के लोग सक्रिय हैं। इन्हीं से बनता है बाज़ार है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ट्रेडिंग करने वाले टेक्निकल एनालिसिस और चार्ट का सहारा लेते ही है। वे जानते हैं कि चार्ट में बाईं तरफ देखकर बताना कितना आसान है कि शेयर का भाव यहां से वहां क्यों गया। लेकिन असली चुनौती जो नहीं हुआ है, उसका पूर्वानुमान लगाने की है, चार्ट के दाहिने तरफ देखने की है जहां फिलहाल कोई भाव या चाल दर्ज नहीं। इसमें पिछले पैटर्न से मदद मिलती है, लेकिन अनिश्चितता खत्म नहीं होती। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी