दिग्गज अर्थशास्त्री से लेकर आम इंसान तक जानता है कि भाव डिमांड व सप्लाई से तय होते हैं। सप्लाई बंधी या कम रहे और डिमांड बढ़ जाए तो भाव पक्का चढ़ जाते हैं। जहां सप्लाई और डिमांड का संतुलन टूटता है, भाव वहीं से रुख बदल लेते हैं। यह सर्वमान्य सच है। मतभेद इसको लेकर होता है कि कौन-सी चीजें डिमांड और सप्लाई को प्रभावित कर रही हैं। इसका जवाब बड़ा महत्वपूर्ण है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

त्योहारों का मौसम शुरू हो चुका है। दशहरा बीत गया। दो हफ्ते बाद दिवाली है। लक्ष्मी का त्योहार। व्यापारियों का त्योहार। व्यापारी खुद कुछ बनाते नहीं बल्कि दूसरों के बनाए माल को बेचनेवाले से लेकर खरीदनेवाले तक पहुंचा देते हैं। उनको कोई मतलब नहीं कि टूथपेस्ट बाबा रामदेव बना रहे हैं या कॉलगेट और वो कैसे बनाया जाता है। व्यापारी को इससे मतलब होता है कि उसे किसमें ज्यादा मार्जिन मिल रहा है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड हर कंपनी के शेयर का अलग बीटा होता है। बीटा सांख्यिकीय गणनाओं से निकाली गई एक संख्या है जिस तक पहुंचने में स्टैंडर्ड डेविएशन व वेरियंस का इस्तेमाल किया जाता है। बीटा बताता है कि कोई स्टॉक पूरे बाज़ार यानी मुख्य सूचकांक के साथ कितनी लय में चलता है। अगर यह एक है तो बाज़ार के एकदम साथ। इससे कम या ज्यादा होना उसकी सापेक्ष चंचलता को दिखाता है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

एनएसई या बीएसई की वेबसाइट भावों के अलावा तमाम ऐसी सूचनाएं देती हैं जिनसे सच तक पहुंचने में मदद मिलती है। इसी तरह की एक सूचना है वैल्यू ऐट रिस्क या वार। कैश सेगमेंट के हर स्टॉक के बारे में बीएसई व एनएसई सांख्यिकी गणनाओं के आधार पर ‘वार’ से जुड़ी चार दरें देते हैं। इन्हें समझ लिया जाए तो अंदाज़ लग सकता है कि वो शेयर गिरा तो कितना गिर सकता है। अब गुरुवार का दशा-दिशा…औरऔर भी

मंगलवार को दशहरा। बुधवार मोहर्रम। दोनों में छिपा हुआ संदेश है असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की जीत। सत्यमेव जयते। आदर्श बाज़ार में भी अंततः सच ही जीतता है। लेकिन दिमाग पर धारणाओं की पट्टी बंधी हो तो सच सामने होते हुए भी नहीं दिखता। सच कहीं अकेले हीरे या मणि की तरह चमकता हुआ नहीं दिखता। वो सूचनाओं के मंथन, उनके मेल से निकलता है। सच सूचनाओं का सार है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

जीवन में कुछ भी स्थिर और शाश्वत नहीं। चीजें अपने विलोम में बदल जाया करती हैं। उसी तरह शेयर बाज़ार में कोई ट्रेन्ड हमेशा के लिए नहीं होता। बाज़ार चक्रों में चलता है। स्टॉक भी कंपनी के मूलभूत पहलू बदलते ही विपरीत ट्रेन्ड पकड़ लेते हैं। मसलन, चार साल से नई ऊंचाइयां पकड़ता रहा जुबिलैंट फूड्स एक साल से गिरता जा रहा है तो उसके मोह से मुक्त हो जाना चाहिए। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में तीन ट्रेन्ड होते हैं। अप-ट्रेन्ड, डाउन-ट्रेन्ड और साइड-वेज़। सिदधांततः तीनों ही ट्रेन्ड में ट्रेडिंग से कमाया जा सकता है। डाउन-ट्रेन्ड में बाज़ार व शेयरों के गिरने पर शॉर्ट सौदों से कमा सकते हैं। मगर, ये सौदे केवल एफ एंड ओ सेगमेंट में किए जा सकते हैं जिसमें न्यूनतम लॉट 5 लाख रुपए का है। वहीं साइड-वेज़ में सीमित रेंज के कारण ज्यादा फायदा नहीं मिलता। तब अप-ट्रेन्ड ही बचता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ट्रेन्ड एक ऐसी चीज़ है जिसे बिना समझे ट्रेडिंग से कमाया नहीं जा सकता है। दो से छह साल (ज्यादा लंबा), छह महीने से दो साल (लंबा), दो महीने से छह महीने (मध्यम) और अभी से दो महीने पहले (अल्पकालिक)। समय के ये चार फ्रेम हैं जिनमें बाज़ार या किसी स्टॉक के ट्रेन्ड को देखा-समझा जाता है। ट्रेन्ड को समझना लगता बड़ा आसान है। लेकिन बड़े-बड़े दिग्गज भी इसमें धोखा खा जाते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

संस्कृत की सदियों पुरानी कहावत है महाजनो येन गतः स पन्थाः। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में भी यह सूक्ति चलती है कि ‘ट्रेन्ड इज़ योर फ्रेन्ड’ और हमेशा ट्रेन्ड के साथ ट्रेड करो। लेकिन कभी ध्यान से सोचने की कोशिश कीजिए कि यह ट्रेन्ड आखिर बनता कैसे है? कौन उसकी चाल का आगाज़ करता है? फिर कभी-कभी तो कोई ट्रेन्ड ही नहीं होता और शेयर बाज़ार सीमित रेंज में कदमताल करते रहते हैं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

चक्रवात हो या सुनामी, उसके आगे छोटे-बड़े या अमीर-गरीब, सभी का रिस्क एक जैसा होता है। इसी तरह बाज़ार का रिस्क संस्थाओं से लेकर रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों तक समान रहता है। फर्क बस इतना है कि दोनों इस रिस्क को अलग तरीके से देखते और उससे निपटते हैं। रिटेल ट्रेडर हमेशा टिप्स पकड़ने के लिए हर किसी से पूछता है कि बाज़ार कहां जाएगा, जबकि संस्थाएं बाज़ार का मूड जानने के लिए। अब सोम का व्योम…औरऔर भी