जब कोई शेयर या कमोडिटी जैसे वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिग करने की सोचता है तो उसके मन में हर तरफ से लड्डू ही लड्डू फूटते हैं। कितना मज़ा आएगा! न कोई बॉस, न सुबह-सुबह ऑफिस जाने का झंझट! घर पर बैठकर अपने लैपटॉप से ट्रेडिंग। बचत से ढाई लाख रुपए भी लगाए तो महीने में 10% कमाने पर ही 25,000 आ जाएंगे। बाकी मूलधन सुरक्षित। इससे ज्यादा और क्या चाहिए रिटायरमेंट के बाद। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बाज़ार में हर दिन 1700 से ज्यादा कंपनियों के शेयरों में ट्रेडिंग होती है। इनमें से सैकड़ों उठते और सैकड़ों गिरते हैं, जबकि 80-90 स्थिर रहते हैं। हमें उठनेवाले शेयरों को पकड़ना है क्योंकि गिरते शेयरों में खेलने का जोखिम उठाना हमारे वश की बात नहीं। उठनेवाले शेयरों में भी हम हर तरफ मुंह नहीं मार सकते हैं। हमें अपने माफिक पड़नेवाले 15-20 शेयरों को ही चुनकर उनमें ट्रेडिंग करनी चाहिए। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

रिटेल ट्रेडर अगर वित्तीय बाज़ार से कमाना चाहते हैं तो उन्हें बहती गंगा में हाथ धोने का हुनर सीखना पड़ेगा। धार, जिसकी दिशा व उफान वित्तीय संस्थाएं, बैंक व एचएनआई निवेशक तय करते हैं। उन्हें अपना सारा दिमाग खबरों पर नहीं, बल्कि इन शक्तियों की चाल को समझने पर लगाना चाहिए। चूंकि बाज़ार में सारे सौदे दर्ज होते और भावों के चार्ट पर झलकते हैं, इसलिए बड़ों की चाल को समझना मुश्किल नहीं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

नदी या समुद्र में दो-चार लोटा पानी डाल देने से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन बांध का पानी छोड़ देने पर नदी में उफान आ जाता है। इसी तरह रिटेल निवेशकों की 200-400 शेयरों की खरीद से बाज़ार पर कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे फर्क पड़ता है हर दिन करोड़ों का खेल करनेवाली देशी-विदेशी संस्थाओं और बैंकों व एचएनआई निवेशकों से। बाज़ार इनके लिए कोई शौक नहीं, बल्कि नियमित आय का धंधा है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

मानते हैं कि टिटहरी को गुमान है कि आकाश अगर गिरेगा तो वह उसे अपने पैरों पर संभाल लेगी। इसीलिए वो पैर ऊपर करके सोती है। हम-आप जैसे रिटेल ट्रेडरों को भी अगर गुमान है कि उनकी खरीद-बिक्री से वित्तीय बाज़ार की चाल पर खास फर्क पड़ता है तो उन्हें इसे फौरन दिमाग से निकाल देना चाहिए। हां, निश्चित रूप से हम भेड़चाल में फंसकर हमेशा गलत वक्त पर गलत फैसला करते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर या किसी भी वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग के दौरान हमारी स्थिति बराबर करो या मरो की रहती है। लालच और भय की भावनाएं हमें जकड़ लेती हैं। तनाव में हमारे शरीर की एड्रेनल ग्रंथि से कोर्टिज़ॉल नामक हॉर्मोन निकलता है जो एक स्तर से ज्यादा होने पर हृदय समेत सारी प्रतिरोधक क्षमता को तगड़ा नुकसान पहुंचाता है। यह हॉर्मोन सुबह 4 से 8 बजे तक न्यूनतम से अधिकतम पर पहुंच जाता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

ट्रेडरों के छोटे-बड़े सभी ग्रुपों में समस्या यह होती है कि उनसे जुड़नेवाले हर किसी का ब्रेनवॉश हो जाता है। सभी एक तरह से सोचने लगते हैं। इस तरह निवेश व ट्रेडिंग में भेड़चाल का शिकार हो जाते हैं। कहने का सार यह कि ट्रेडिंग ग्रुप से जुड़ना समस्या सुलझाता नहीं, बल्कि उलझा देता है। अपने पर भरोसा रखकर यह समझें कि आम व्यापारी कैसे खरीद-बेचकर कमाता है। इसे बनाएं अपनी मूल रणनीति। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेरों का झुंड मिलकर शिकार करता है। लेकिन ट्रेडरों में शायद ही कोई समूह ऐसा होगा जो बराबर फायदा कमाता है। समूह में कोई इधर खींचता है तो कोई उधर। खबरों व फंडामेंटल्स पर खेलनेवाला अपने को उस्ताद समझता है तो टेक्निकल एनालिसिस वाला खुद को किसी से कम नहीं समझता। फिबोनाकी संख्याएं व इलियट वेव्स भी उछाली जाती हैं। मगर, सभी बाज़ार से पीछे चलते हैं और बराबर मात खाते रहते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ट्रेडरों में दो खास ग्रुप चलते हैं। एक में ऐसे ट्रेडर हैं जिन्होंने अपना सिस्टम बना रखा है और बराबर मुनाफा कमाते हैं। वे सामाजिक दायरा बढ़ाने के लिए समूह बनाते हैं। दूसरा और कहीं ज्यादा बड़ा ग्रुप ऐसे ट्रेडरों का है जो हवा में तीर मारते हैं और कभी-कभार कमाते हैं। वे किसी ज्ञान/नुस्खे या टिप्स में चक्कर में समूह बना डालते हैं। दुर्भाग्य से उनकी कोशिश सरासर मृग-मरीचिका साबित होती है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

संघे-शक्तिः कलियुगे। आज जिसके पास संगठन और समूह है, वही जीतता है। अक्सर ट्रेडिंग में अकेले पड़ जाने के बाद हमें भी ऐसा लगता है। हम किसी न किसी ग्रुप से जुड़ने की फिराक में पड़ जाते हैं। कहीं नहीं तो फेसबुक जैसी सोशल वेबसाइट्स पर ही ग्रुप बना लेते हैं। लेकिन इससे ट्रेडिंग की सफलता में सचमुच हमें कुछ फायदा मिलता है या इसमें भी अच्छी-बुरी संगत से फर्क पड़ता है? अब परखें मंगलवार की बुद्धि…औरऔर भी