सूचकांक भले ही नई ऊंचाइयां छूते जा रहे हों। लेकिन पूरे शेयर बाज़ार में जहां हर दिन कुछ शेयर 52 हफ्ते का उच्चतम स्तर बना लेते हैं, वहीं कुछ शेयर न्यूनतम स्तर पकड़ लेते हैं। मसलन, बीते शुक्रवार को एनएसई में जहां 92 शेयर शिखर पर पहुंच गए, वहीं 40 शेयर साल भर के न्यूनतम स्तर तक जा गिरे। हमें ट्रेडिंग करते हुए इन उठते-गिरते शेयरों पर बारीक नज़र रखनी चाहिए। अब परखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार के आगे अमेरिका या ब्रिटेन की राजनीतिक अनिश्चितता के साथ-साथ घरेलू अस्थिरता का भी रिस्क आ खड़ा हुआ है। आर्थिक रिस्क पहले ही चौथी तिमाही में जीडीपी के कमज़ोर आंकड़ों के रूप में झलक दिखला चुका है। पहली जुलाई से देश भर में जीएसटी लागू होने जा रहा है। व्यापारी तबका इसको लेकर बहुत परेशान है। कहीं यह ‘आसान’ टैक्स महीनों तक सब कुछ जाम न कर दे। अब करते हैं शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

देश में हर महीने कम से कम 10 लाख नौजवान रोज़गार की लाइन में लग जाते हैं, यानी साल भर में करीब डेढ़ करोड़। नौजवानों की बढ़ती तादात को अर्थव्यवस्था के लिए वरदान माना जाता रहा है। लेकिन उन्हें काम-धंधे या नौकरियों में नहीं खपाया जा सका तो इस वरदान को अभिशाप बनते देर नहीं लगेगी। यह मोदी सरकार के लिए बेहद गंभीर चुनौती है। इसे जुबानी जमाखर्च से नहीं निपटा जा सकता। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

पिछले दिनों जिस तरह महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश के बाद देश के तमाम राज्यों में किसान आंदोलन भड़क गया, उसे देखते हुए फिलहाल राजनीतिक रिस्क बहुत ज्यादा बढ़ गया लगता है। मालूम हो कि खेती-किसानी ने शिव की जटा की तरह असंतोष की उफनती गंगा को समेटकर रखा हुआ है। करोड़ों बेरोज़गार गांवों में खेती से जबरन चिपके हुए हैं। अगर एक बार वे वहां से छिटके तो उन्हें संभालना मुश्किल हो जाएगा। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

ज़मीन पर चलनेवाले को फिसलने का डर रहता है, खाईं में गिरने का डर नहीं रहता। लेकिन चोटी पर चढ़ा हुआ शख्स ज़रा-सा फिसला तो गहरी घाटी में गिर सकता है। साल 2008 में ऐसा हो चुका है। तब भी बहुत सारे आईपीओ आ रहे थे। बाज़ार के नए आसमान पर चढ़ने की बात की जा रही थी। लेकिन अचानक गिरा तो वह खजूर पर नहीं अटका, बल्कि सीधे रसातल जा पहुंचा। अब आजमाएं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में उन्माद-सा छाया हुआ है। जबरदस्त आशावाद। कोई कहता है, निफ्टी अगले एक-डेढ़ साल में 2000 अंक बढ़ जाएगा और तीन साल में 13,000 तक पहुंच सकता है। इसी तरह साल भर के भीतर सेंसेक्स के 54,000 तक उठने की बात की जा रही है। ऐसे में निवेशकों ही नहीं, बहती धारा के साथ बहनेवाले ट्रेडरों को भी बेहद सावधान रहने की ज़रूरत है। वरना, अचानक डूब गए तो! अब परखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

जो खबर आनी थी, आ चुकी। अब आप हिसाब लगाते हैं कि उसका बाज़ार पर ज़रूरत से ज्यादा असर हुआ है या ज़रूरत से कम। दोनों ही स्थितियों में आप ट्रेडिंग कर सकते हैं। मसलन, ज्यादा गिरा तो वह पलटकर उठ सकता है। वहीं, कम गिरा तो ज्यादा गिर सकता है। यह एक तरह का अनुमान है जिसका सही-गलत होना बाज़ार के पैटर्न व स्वभाव से आपके परिचित होने पर निर्भर करता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

नियत समय पर आनेवाली खबरों पर ट्रेड करने का एक तरीका हुआ, उनके आने से पहले अनुमान लगाकर रिस्क उठाना। दूसरा तरीका है खबर आने के बाद ट्रेड करना। यह तरीका अचानक टपक पड़नेवाली खबरों पर भी लागू होता है। ऐसा करने में होड़ बहुत ज्यादा होती है। इसलिए रिटेल ट्रेडर के पिट जाने का खतरा भी बहुत है। हालांकि बाज़ार बंद होने के बाद आनेवाले नतीजों/समाचारों पर खेलना थोड़ा आसान होता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

खबरों पर ट्रेड करना बहुत रिस्की है। वैसे, शेयर बाज़ार स्वभाव से ही रिस्की है और रिस्क व रिवॉर्ड के बीच सीधा समानुपाती रिश्ता है। फिर, खबरों से कैसे खेला जाए? जैसे, आज ढाई बजे रिजर्व बैंक मौद्रिक समीक्षा घोषित करेगा। अगर बाज़ार में आम धारणा है कि वो ब्याज दर घटाएगा। मगर आपको लगता है कि ऐसा नहीं तो आप औपचारिक घोषणा से पहले अपनी सोच के माफिक ट्रेड कर सकते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

जब खबरों का ज़ोर चलता है तो टेक्निकल एनालिसिस कतई कोई काम नहीं करती। मगर, हमारे अधिकांश ट्रेडर ट्रेडिंग के लिए इसी का ही सहारा लेते हैं। ऐसे में खबरों को अपनी ट्रेडिंग रणनीति में कैसे शामिल किया जाए? खबरें दो तरह की होती है। एक का आना पहले से तय होता है। जैसे, कल रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति समीक्षा पेश करेगा या कंपनियों के तिमाही नतीजे। दूसरी, जो अचानक टपक पड़ती हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी