जिनके पास सीमित बचत है, जो बस इतना कमाते हैं कि घर-परिवार चला लेने और आकस्मिकता से निपटने का इंतज़ाम कर लेने के बाद सालाना 40-50 हज़ार बचा पाते हैं, उनके लिए वित्तीय सलाहकार रखना संभव नहीं। उन्हें तो खुद ही वित्तीय रूप से साक्षर के साथ-साथ शिक्षित भी बनना पड़ता है। उन्हें बीमा का चक्कर भी समझना पड़ता है और शेयर बाज़ार से लेकर म्यूचुअल फंडों तक की जानकारी रखनी पड़ती है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

जो लोग अपने लिए सर्वोत्तम वित्तीय फैसले करना भलीभांति जानते हैं, वे मनचाही ज़िंदगी जी लेते हैं। वहीं, जो लोग वाजिब वित्तीय फैसले लेना नहीं जानते, उनके सामने सीमित विकल्प होते हैं। वे दरअसल दूसरों द्वारा तय की गई ज़िंदगी जीते हैं। जिनके पास पर्याप्त धन है, वे तो वित्तीय सलाहकार की सेवाएं ले सकते हैं। लेकिन अगर वे भी वित्तीय रूप से शिक्षित नहीं हैं तो सलाहकार उनकी जेब काट सकता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अक्सर जटिल समस्याओं का समाधान बड़ा सरल होता है। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग भी इसका अपवाद नहीं है। हर व्यापार में धंधे का सूत्र है थोक में खरीदकर रिटेल में बेचना। यही मूलमंत्र है शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग से कमाने का। साथ ही भाव डिमांड और सप्लाई के संतुलन से निर्धारित होते हैं तो इसका भी ध्यान रखना चाहिए। तीसरी बात, डिमांड और सप्लाई का स्तर संस्थाएं तय करती हैं, रिटेल ट्रेडर नहीं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सिस्टम बनाने के लिए मूल आधार बाज़ार व शेयर का पिछला रिकॉर्ड है। टेक्निकल एनालिसिस जैसे तमाम सिद्धांत इसमें पैठने के लिए निकाले गए हैं। दिक्कत यह है कि जैसे ही कोई सिद्धांत या तरीका आम बनता है तो ट्रेडर की धार कुंद हो जाती है क्योंकि सभी वैसा ही कर रहे होते हैं। मसलन, कल की कामयाब क्वांट रणनीति अब नाकाम हो चुकी है। इसलिए हमें अपनी रणनीति बराबर संवारनी पड़ती है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में अतीत की सीख और वर्तमान की समझ के आधार पर हम भविष्य का सौदा करते हैं। भविष्य कोई नहीं जानता। इसलिए हम अधिकतम यही कर सकते हैं कि न्यूनतम रिस्क में सही बैठने की अधिकतम प्रायिकता वाले सौदे चुनें और अपनी ट्रेडिंग पूंजी बचाकर चलें। इस सोच के साथ सिस्टम ऐसा बनाएं कि  हम उन्नीस पर बीस नहीं तो कम से कम 19.05 तो साबित ही हो जाएं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

ट्रेडिंग के लिए सौदे चुनने में दूसरा मदद ही कर सकता है। वह आपके चयन का दायरा बढ़ा सकता है। हर दिन ट्रेड होनेवाली 1500 से ज्यादा कंपनियों में से दो-चार चुनकर आपके लिए पेश कर सकता है। वो घुसने, निकलने और स्टॉप-लॉस की गणना भी कर सकता है। लेकिन उसका चयन आपके सिस्टम पर कितना खरा उतरता है और ट्रेड में घुसने, निकलने व स्टॉप-लॉस का सटीक स्तर आपको ही निकालना चाहिए। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वैसे तो स्वर्ग या नरक किसी दूसरे लोक नहीं, बल्कि इसी धरती पर होते हैं। लेकिन कहावत है कि बिना खुद मरे स्वर्ग नहीं मिलता। इसी तरह शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाई तब तक नहीं होती, जब तक आप अपना खुद का सिस्टम नहीं विकसित करते। हर किसी का रिस्क प्रोफाइल अलग है और उसे उसी हिसाब से सौदे करने होते हैं। सिद्धांत व व्यवहार का फासला उसे ही पाटना होता है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

चार्ट पर शेयर भावों के रुख का संभावित बदलाव कैसे पकड़ा जा सकता है? सबसे ताज़ा भाव पर पेंसिल या उंगली रखें और बायीं तरफ वहां तक ले जाएं, जहां से ठीक पिछली बार भाव उठे और गिरे थे। वहां नीचे हैमर और ऊपर रिवर्स हैमर जैसी कैंडल हैं तो उनकी अलग-अलग रेंज खरीद और बिक्री का दायरा बता सकती हैं। स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेड के लिए साप्ताहिक चार्ट को पकड़ना चाहिए। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

आखिर भाव कहां रुख बदलते और कहां जाकर पलट सकते हैं? भाव वहां से चढ़ते हैं जहां खरीदने की चाह और मांग ज्यादा होती है, जबकि लोग बेचने को उत्सुक नहीं होते। वहीं, भाव वहां से गिरते हैं जहां ज्यादातर लोग बेचने को तैयार होते हैं, जबकि खरीदनेवाले बेहद कम होते हैं। मूर्ख या रिटेल ट्रेडर गिरे भावों पर बेचते और चढ़े भावों पर खरीदते हैं। समझदार या संस्थाएं इसका उल्टा करती हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

हमें खुद से बड़ा सीधा-सरल पूछना चाहिए कि शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग/निवेश से कैसे फायदा कमाया जाता है। इसका आसान जवाब है कम भाव पर खरीदना और ज्यादा भाव पर बेचना। मगर सवाल उठता है कि हम सस्ते में खरीद कर महंगे भाव पर कैसे बेच सकते हैं? जवाब है ठीक उस मोड़ पर खरीद या बेचकर जहां से शेयरों के भाव रुख बदलते हैं। यहां से उठता है अगला सबसे अहम सवाल। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी