कमोबेश सभी विशेषज्ञ मानते हैं कि साल 2018 में शेयर बाज़ार पिछले कुछ सालों जितना तेज़ नहीं रहने जा रहा। एक वजह तो यह है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक अब शेयरों से ज्यादा सरकारी या कॉरपोरेट ऋण को अहमियत देने लगे हैं। दूसरी वजह है कि मार्च से राज्यों के चुनावों का जो सिलसिला शुरू हो रहा है, वह राजनीतिक उहापोह पैदा कर सकता है। तीसरे, मोदी सरकार कठोर आर्थिक फैसलों से बचेगी। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था की हालत खराब। कंपनियों के नतीजे भी कुछ उत्साह बढ़ाने वाले नहीं हैं। फिर भी शेयर बाज़ार कुलांचे मारता जा रहा है। निफ्टी व सेंसेक्स रोज़ नए ऐतिहासिक शिखर बना रहे हैं। वजह है कि विदेशी फंड, देशी म्यूचुअल फंड और एलआईसी जैसी संस्थाएं शेयर बाज़ार में खरीद पर खरीद किए जा रही हैं। इन्होंने 2017 में शेयर बाज़ार में क्रमशः 51,252 करोड़, 1.25 लाख करोड़ और 44,000 करोड़ रुपए डाले हैं। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार मूलतः अर्थव्यवस्था का आईना होता है। खुद सरकार के मुताबिक, इस साल अर्थव्यवस्था की विकास दर पिछले चार सालों में सबसे खराब रहेगी। 2017-18 में जीडीपी के 6.5% बढ़ने का अनुमान है, जबकि 2016-17 में यह 7.1%, 2015-16 में 8% और 2014-15 में 7.5% बढ़ा था। यह नीतिगत लकवे की शिकार यूपीए सरकार के आखिरी साल 2013-14 की दर 6.9% से कम है। फिर भी बाज़ार बम-बम किए जा रहा है! अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

हम कितना भी ज्ञान हासिल कर लें, अपनी नज़र बहुत-बहुत व्यापक बना लें, लेकिन संपूर्ण सच हमारी पकड़ से हमेशा बाहर ही छिटक जाता है। शेयर बाज़ार पर यह नियम कुछ ज्यादा ही लागू होता है क्योंकि वह तर्कों से ज्यादा लाखों लोगों की लालच व डर जैसी स्थूल भावनाओं से नियंत्रित होता है। इन लोगों में अब दुनिया के ग्लोबल हो जाने के बाद विदेशी भी शामिल हो गए हैं। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

दिक्कत यह है कि अपने यहां आर्थिक आंकडों का घनघोर अकाल है। मुद्रास्फीति या औद्योगिक उत्पादन को छोड़ दें तो हम बहुत सारे आंकड़ों मे बहुत-बहुत पीछे चलते हैं। इसलिए बहुत सारे काम में अंदाज़ चलता है। ऐसा ही एक अंदाज़ है कि शेयर बाज़ार के लगभग 95% ट्रेडर घाटा उठाते हैं, जबकि बमुश्किल 5% ही कमा पाते हैं और इन 95% ट्रेडरों में से तकरीबन सारे के सारे रिटेल ट्रेडर होते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

आयकर विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2014-15 या आकलन वर्ष 2015-16 में शेयर बाज़ार से हुई आय पर शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स देने या घाटा क्लेम करनेवाले ट्रेडरों की संख्या 38.19% बढ़ गई। हम इसके आधार पर आसानी से अनुमान लगा सकते हैं कि बाद के ढाई सालों में हमारा शेयर बाज़ार जिस तरह से बढ़ा है, उसमें सक्रिय ट्रेडरों की संख्या बराबर ऐसी ही तेज़ी से बढ़ रही होगी। अब गुरुवार की दशा-दिशा…और भीऔर भी

तीन करोड़ डीमैट खातों में से 50 लाख ट्रेडर। इस तरह देश में फिलहाल कुल डीमैट खाताधारकों में से करीब 16% ट्रेडर हैं। इनमें से करीब 15% ही शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स दे या घाटा क्लेम कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में 2.41% निवेशक ही ट्रेडिंग से दिखा सकने लायक आय कमा रहे हैं। हालांकि शेयर बाज़ार से हुई आय पर शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स देनेवालों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडर उन्हें माना जाएगा जो साल भर के भीतर शेयर बेच देते हैं। आयकर विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2014-15 के दौरान देश में सक्रिय ट्रेडरों की संख्या करीब 50 लाख थी। इनमें से 7.34 लाख ट्रेडरों ने शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स भरा या घाटा क्लेम किया था। शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स की दर 15% है, जबकि साल भर बाद बेचने पर कोई कैपिटल गेन्स टैक्स नहीं लगता। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

हमारे यहां शेयर बाज़ार में कितने लोग सक्रिय ट्रेडिंग करते हैं? दोनों डिपॉजिटरी कंपनियों के सम्मिलित आंकड़ों के मुताबिक देश में कुल डीमैट खातों की अद्यतन संख्या 3.04 करोड़ है। माना जा सकता है कि शेयर बाज़ार के निवेशकों की संख्या इसी के आसपास होगी। वैसे, बीएसई के मुताबिक निवेशकों की मौजूदा संख्या 3.72 करोड़ है। अंदाज़ लगाइए कि इनमें से कितने लोग महीने में कम से कम एक बार ट्रेडिंग करते होंगे? अब सोम का व्योम…औरऔर भी

अर्थशास्त्र के महाज्ञानी, नोबेल पुरस्कार विजेता तक कह चुके हैं कि छोटी अवधि में शेयरों के भावों की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। दूसरे शब्दों में शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग मूलतः अटकलबाज़ी या कयासबाज़ी पर ही आधारित है। हालांकि बाज़ार के मनोविज्ञान और भावों के पिछले पैटर्न से नई खरीद या बिक्री का अनुमान लगाया जाता है। लेकिन वह भी होता तो अनुमान ही है। इसलिए यहां स्टॉप लॉस न लगाना आत्मघाती है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी