अमेरिका में अकेले जनवरी महीने में दो लाख नई नौकरियां जुड़ना और उसके चलते ब्याज दर बढ़ाए जाने के भरोसे से डाउ जोन्स सूचकांक का लुढ़क जाना या अपने यहां लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स का लगना। बजट के बाद अपने शेयर बाज़ार के गिरने की दोनों ही वजहें मानी जा रही हैं। यह भी कहा जा रहा है कि शेयरों में बनते बुलबुले को तोड़ने के लिए सरकार ने यह टैक्स लगाया। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2017-18 की छठी व आखिरी दोमाही मौद्रिक नीति समीक्षा में ब्याज दरों को जस का तस रखा है। लेकिन आर्थिक विकास दर का अनुमान 6.7% से घटाकर 6.6% कर दिया और माना है कि अगले वित्त वर्ष 2018-19 की पहली छमाही में रिटेल मुद्रास्फीति की दर 5.6% तक जा सकती है। बॉन्ड बाज़ार ने इसे शांति से लिया है और सरकारी बॉन्डों पर यील्ड कमोबेश अपरिवर्तित रही। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्त मंत्री जेटली ने बजट में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स लगाते वक्त गिनाया था कि आकलन वर्ष 2017-18 (वित्त वर्ष 2016-17) में 3.67 लाख करोड़ रुपए की कमाई लिस्टेड शेयरों व यूनिटों से की गई। इसलिए इतनी बड़ी कमाई पर टैक्स लगाना ज़रूरी है। लेकिन क्या वे बताएंगे कि बजट के बाद से अब तक शेयर बाज़ार से 7.87 लाख करोड़ रुपए की जो पूंजी स्वाहा हो गई, उसकी भरपाई कौन करेगा? अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

कहते हैं कि शेयर बाज़ार के बढ़ने ही नहीं, गिरने पर भी कमाया जा सकता है और लोग कमाते भी हैं। डी-मार्ट के मालिक राधाकृष्ण दामाणी के बारे में मशहूर हैं कि मंदी से खूब कमाते रहे हैं। लेकिन कम पूंजीवाले ट्रेडरों के लिए गिरावट से कमाना संभव नहीं होता। आमलोग जमकर निफ्टी का पुट ऑप्शंस खरीदते हैं। लेकिन असली कमाई पुट ऑप्शंस बेचनेवाले करते हैं जिसमें मार्जिन फ्यूचर्स जैसा ज्यादा होता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

नए वित्त वर्ष के बजट के साथ शेयर बाज़ार में शुरू हुआ गिरावट का सिलसिला कहां जाकर रुकेगा, कहा नहीं जा सकता। घबराहट और अफरातफरी का माहौल छाया है। क्या जेटली का बजट चार साल से चले आ रहे मोदी के जादू का परदा गिरा देगा? क्या लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स लगाना देश के पूंजी बाज़ार व अर्थव्यवस्था के लिए भारी पड़ेगा? आगे हमारी राजनीति क्या करवट लेगी? सवालों के बीच देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

हमारा ध्येय शेयर बाज़ार में न्यूनतम रिस्क में अधिकतम कमाना होना चाहिए। तेज़ी के मौजूदा दौर में रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात काफी घट गया है। भले ही बजट में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स लगा दिया गया हो। मगर बेहतर होगा कि ऐसे में ट्रेडिंग रोककर दो-तीन साल के लंबे निवेश का रुख कर लें। फिर भी अगर ट्रेडिंग करनी है तो उन कंपनियों में करें जिनके स्टॉक्स फंडामेंटल मजबूती के बावजूद दबे पड़े हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में तेज़ी का दौर अक्सर कुछ लंबा ही खिंच जाता है। पी/ई जैसी तमाम गणनाएं फेल हो जाती हैं और बाज़ार उम्मीद से ज्यादा महंगा होता चला जाता है। कोई भी ट्रेडर इस तेज़ी का फायदा उठाना चाहेगा। लेकिन इस दौरान ट्रेड करना काफी रिस्की हो जाता है। इसलिए इस दरम्यान ट्रेडिंग में हमें शेयर बाज़ार में लगाने के लिए निकाले धन का कम से कम हिस्सा लगाना चाहिए। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

पिछले साल एलआईसी, बैंकों व म्यूचुअल फंडों जैसी देशी वित्तीय संस्थाओं ने शेयर बाज़ार में जमकर खरीद की तो इस साल की शुरुआत से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक बाज़ार में डॉलर झोंके पड़े हैं। हालांकि वे सरकारी व कॉरपोरेट बांडों में भी जमकर निवेश कर रहे हैं क्योंकि इधर बांडों के सस्ते होने उनकी प्रभावी यील्ड बढ़ती जा रही है। लेकिन उनकी साफ राय है कि भारतीय शेयर बाज़ार शानदार रिटर्न दे सकता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की अभी की तेज़ी में बैंकिंग व फाइनेंस कंपनियों के शेयर कुछ ज्यादा ही चढ़ गए हैं। 3 अप्रैल 2017 से जनवरी में पिछले हफ्ते तक बैंक निफ्टी 27.4% बढ़ा है। इसी दरम्यान एचडीएफसी बैंक 37.7%, ग्रुह फाइनेंस 73.8%, बजाज फाइनेंस 50.9% और मोतीलाल ओसवाल 89.8% बढ़े हैं। इस तरह बाज़ार के बुलबुले का दायरा काफी सीमित है तो हमारे लिए निवेश या ट्रेडिंग के मौके ज्यादा कम नहीं हुए हैं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सामाजिक संगठन के प्रमुख मोहन भागवत बीएसई पहुंचकर स्टॉक एक्सचेंज के बाहर बने सांड के सींग पकड़कर फोटो खिंचवाने लग जाएं तो समझ लेना चाहिए कि शेयर बाज़ार में तेज़ी का पारा कितना ऊपर चढ़ चुका है। बाज़ार कितना और कब तक ऊपर जाएगा, यह कोई नहीं बता सकता। जब तक देशी या विदेशी संस्थाओं की खरीद जारी रहेगी और बिकवाली पर भारी पड़ेगी, तब तक बाज़ार बढ़ेगा। अब सोम का व्योम…औरऔर भी