जीवन में हम इसलिए नहीं मात खाते कि हम कम जानकार या बुद्धिमान हैं, बल्कि ज्यादातर मात हम इसलिए खाते हैं क्योंकि जो जैसा है, उसे वैसा उसी रूप में, यथाभूत नहीं देख पाते। हम मन पहले बनाते हैं। फिर दूसरों की बात-सलाह और आंकड़ों से उसकी पुष्टि करते हैं। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में हम मन के आईने से सच देखते हैं, जबकि असली सच दूर खड़ा हमें चिढ़ाता रहता है। अब सोमवार का व्योम…और भीऔर भी

क्या डेरिवेटिव सौदों में हाथ डालना आम निवेशकों के लिए वाजिब है? असल में निफ्टी ऑप्शंस अपने-आप में बहुत लुभावना ट्रैप है। निफ्टी के कॉल या पुट सौदों में ज्यादा धन लगता नहीं और जनरल इंश्योरेंस की तरह जितना लगता है, ज्यादा से ज्यादा उतना ही डूबता है तो लोग छपाक से कूद पड़ते हैं। लेकिन इस सेगमेंट में 3/4 से ज्यादा सटोरिया ऑपरेटर सक्रिय हैं। एफआईआई या डीआईआई 1/4 तक सिमटे हैं। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

वित्तीय संस्थाएं और बैंक तो साल भर ट्रेड करते हैं। लेकिन बहुत सारे प्रोफेशनल ट्रेडर कुछ ही महीने ट्रेड करते हैं। मसलन, कुछ ट्रेडर केवल तिमाही नतीजों के दौरान ही सक्रिय होते हैं। वे नतीजों से जोड़कर कंपनी के शेयर की चाल पर गौर करते हैं और उसके अनुरूप धैर्य से खरीदने या बेचने का फैसला करते हैं। वे अपना रिस्क अच्छी तरह जानते-समझते हैं। लेकिन अनावश्यक सटोरियापन से बचते हैं। अब पकड़ते हैं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

संस्थाओं और प्रोफेशनल निवेशकों का अपना-अपना अलग अंदाज़ है। लेकिन वे किसी तनाव में आए बगैर बड़ी शांति से काम करते हैं। कुछ हैं जो केवल निफ्टी-50 सूचकांक के स्टॉक्स में ही ट्रेड करते हैं। इसमें भी कुछ तो केवल चुनिंदा 20 स्टॉक्स को ही हाथ लगाते हैं। वहीं, कुछ चार-पांच स्टॉक्स तक सीमित हैं। बाकी बाज़ार कहां जा रहा है, इसको जानते ज़रूर हैं, लेकिन उस पर फालतू की मगज़मारी नहीं करते। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

सेक्टर के साथ-साथ कंपनी भी तय कर ली। लेकिन एंट्री और एक्जिट कहां करना है, इसका जवाब संस्थाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए उनकी टीम कंपनी की शेयरधारिता के पैटर्न से लेकर वित्तीय पहलुओं का बारीक विवेचन करती है। इसके बाद भावों का वो ज़ोन तय किया जाता है, जहां एंट्री करनी है और जहां से बाहर निकलना है। उनकी यह हरकत पकड़ लें तो हमारा कल्याण हो सकता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सेक्टर तय कर लेने के बाद संस्थागत निवेशक देखते हैं कि उसमें भी कौन-सी कंपनियों के स्टॉक अच्छे चल रहे हैं और उनका फंडामेंटल आधार भी मजबूत है ताकि शेयर गिरे भी तो अंततः संभल जाए। वे कोई नकारात्मक झटका नहीं चाहते। फिर भी बाज़ार है तो अचानक कुछ घटने का खतरा बना ही रहता है। इस जोखिम को साधने के लिए वे पोजिशन साइजिंग से लेकर स्टॉप-लॉस जैसे तमाम तरीके अपनाते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बैंक, बीमा कंपनियां और प्रोफेशनल ट्रेडर एक साथ बाज़ार में हर तरफ हाथ-पैर नहीं मारते। वे गहराई से परखते हैं कि कौन-से सेक्टर में अभी तेज़ी की लहर चल रही है या चलनेवाली है। वे भारतीय मुद्रा से लेकर मुद्रास्फीति जैसे तमाम पहलुओं पर नज़र रखते हैं और उसका फायदा उठाते हैं। मसलन, रुपया डॉलर के सापेक्ष कमज़ोर हो रहा हो तो उन्हें आईटी या फार्मा जैसे निर्यात से कमानेवाले सेक्टर सुहाते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार के गुरुघंटाल एक बार पकड़ लें तो आखिरी बूंद तक निचोड़ लेते हैं। इसलिए उनके चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहिए। असल में सारी विद्या आपके सामने खुली है। कमियों के बावजूद हमारा शेयर बाज़ार इतना पारदर्शी है कि नज़र व समझ हो तो सब कुछ खुद जान-समझ सकते हैं। मोटी-सी बात यह है कि आपको किसी विशेषज्ञ की सलाह नहीं, बल्कि संस्थाओं की चाल को समझने की पुरज़ोर कोशिश करनी चाहिए। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

ट्रेडिंग भयंकर मायाजाल है। लगता है कि बहुत सारे शेयर एक ही दिन में 4-5% बढ़ जाते हैं तो हम क्यों नहीं कमा सकते। काश, कोई पहले से हमें इनके बारे में बता देता! यहीं पर हम घात लगाए बैठे बहुतेरे गुरुओं व सलाहकारों का शिकार बन जाते हैं। हफ्ते-दस दिन की मुफ्त की सेवा। उसके बाद खुदा-न-खास्ता फंसे तो हज़ारों की फीस। फिर ट्रेडिंग का विकट चक्रव्यूह हमें निचोड़कर फेंक देता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बैंकों या बीमा कंपनियों के लिए कुछ दिनों में 4-5% का मुनाफा पर्याप्त होता है। इतना मुनाफा पाकर वे पहले निकल लेते हैं। फिर शेयर वहां से 2% तक गिर गया तो दोबारा खरीद लेते हैं। जब तक शेयर का भाव निर्धारित लक्ष्य तक नहीं पहुंच जाता, तब वे उसे इसी तरफ फेटते रहते हैं। उनका एक-एक सौदा करोड़ों का होता है, इसलिए 4-5% फायदा भी उन्हें आराम से लाखों दे जाता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी