बीते हफ्ते केनरा बैंक, इलाहाबाद बैंक, यूको बैंक और देना बैंक के नतीजों से पता चला कि इन चार सरकारी बैकों को मार्च तिमाही में 11,729 करोड़ रुपए का सम्मिलित घाटा लगा है। यही नहीं, बढ़ते एनपीए के चलते इस दौरान निजी क्षेत्र के आईसीआईसीआई बैंक का शुद्ध लाभ 45% घट गया, जबकि एक्सिस बैंक को लिस्टिंग के बाद पहली बार शुद्ध घाटा हुआ, वो भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि 2188.7 करोड़ रुपए का। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाजार मूलतः देश की औद्योगिक प्रगति का आईना है। लेकिन अपने यहां संस्थाओं व अमीरतम लोगों की मोटी रकम आने से बाज़ार कमज़ोर होती औद्योगिक स्थिति के बावजूद फूलकर कुप्पा हुआ पड़ा है। ताज़ा आंकड़ा आया है कि मार्च में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक की वृद्धि दर घटकर 4.4% रह गई है, जबकि उससे पहले के चार महीनों की औसत दर 7.6% रही थी। यही नहीं, देश का निर्यात भी घट गया है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

पहली अक्टूबर से हमारे प्रतिभूति बाज़ार में बड़े परिवर्तन होने जा रहे हैं। स्टॉक एक्सचेंजों को शेयरों के साथ ही कमोडिटी डेरिवेटिव में ट्रेडिंग की इजाजत दी जा चुकी है। इसके अलावा इक्विटी डेरिवेटिव की ट्रेडिंग का समय सुबह 9 बजे से शाम 3.30 बजे से बढ़ाकर मध्यरात्रि 11.55 बजे तक कर दिया गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि कमोडिटी डेरिवेटिव की ट्रेडिंग सुबह 10 बजे से रात 11.55 बजे तक हो रही है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

डाउ सिद्धांत का नया रूप यह है कि शेयर बाज़ार में मार्क-अप, डिस्ट्रीब्यूशन और मार्क-डाउन के तीन दौर होते हैं। मार्क-अप में सबसे पहले समझदार निवेशक व कंपनियों के अंदर के लोग एंट्री लेते हैं। इसके बाद बैंक, वित्तीय संस्थाएं व प्रोफेशनल ट्रेडर घुसते हैं। म्यूचुअल फंड सबसे अंत में आते हैं। डिस्ट्रीब्यूशन के दौर में रिटेल ट्रेडर घुसते हैं। मार्क-डाउन में समझदार सबसे पहले और म्यूचुअल फंड सबसे बाद में निकलते हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

वॉल स्ट्रीट जनरल के पहले संपादक और डाउ जोन्स एंड कंपनी के संस्थापक थे चार्ल्स एच. डाउ। करीब सौ साल पहले उनके लिखे अनेक संपादकीय के आधार पर डाउ सिद्धांत निकाला गया। इसके मुताबिक शेयर बाज़ार में तीन प्रमुख दौर चलते हैं। एकट्ठा करने का दौर, व्यापक लोगों की भागादारी का दौर और बेचकर मुनाफा कमाने या वितरण का दौर। आमतौर पर रिटेल निवेशक पहले दौर के बजाय तीसरे दौर में आते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

यूं तो शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में वोल्यूम का बहुत ज्यादा महत्व नहीं होता। वैसे भी इसके आंकड़े इतना गड्डम-गड्ड होते हैं कि इससे कोई साफ तस्वीर नहीं उभरती। इसलिए इसके चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन इसका भान ज़रूर होना चाहिए कि बाज़ार में इतने करोड़ों का कारोबार कौन लोग खड़ा करते हैं। आम निवेशकों या ट्रेडरों की स्थिति सागर तो नहीं, लेकिन तालाब में एक मग पानी से ज्यादा नहीं होती। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बीएसई व एनएसई के कैश सेगमेंट में हर दिन औसतन 32,000 करोड़ रुपए का कारोबार। डेरिवेटिव सेगमेंट में यह आंकड़ा 4 लाख करोड़ रुपए तक चला जाता है। शेयर बाज़ार में पंजीकृत निवेशकों की संख्या 3.88 करोड़ हो चुकी है। लेकिन बराबर सक्रिय निवेशकों या ट्रेडरों की संख्या दो लाख से ज्यादा नहीं होगी। देशी व विदेशी संस्थाएं 10-12 हज़ार करोड़ रुपए से ज्यादा का धंधा नहीं करतीं। कौन हैं बाकी खिलाड़ी! अब सोम का व्योम…और भीऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाना है तो हमें समग्र अर्थशास्त्र के बजाय इंसान के धन-संबंधी मनोविज्ञान को कायदे से समझना पड़ेगा। तभी हम अपने पूर्वाग्रहों के निजात पा सकते हैं। इनमें सबसे अहम पूर्वाग्रह है कि हम फायदे पर जितना चहकते हैं, उतनी ही रकम के नुकसान पर दोगुना दुखी हो जाते हैं। इस सोच के चलते घाटा लगने पर भी किसी सौदे को छोड़ नहीं पाते और घाटा बढ़ाते जाते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

दुनिया हमारे मन से नहीं, अपने नियम-धर्म से चलती है। धन से जुड़े वित्तीय बाज़ार का हाल तो एकदम निराला है। व्यक्तियों का मनोविज्ञान जब एक साथ मिलकर समूह का मनोविज्ञान बनता है तो उसका रूप-रंग एकदम बदल जाता है। लेकिन हम मन में जमे अपने पूर्वाग्रहों से इस कदर चिपके रहते हैं कि सामूहिक मनोवैज्ञानिक को समझ नहीं पाते। ट्रेडिंग से कमाने में हमारा यह सहज ‘संस्कार’ बड़ा घातक साबित होता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में बहुत सारा ज्ञान काम नहीं आता। मशहूर किस्सा है कि साल 1720 में न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिक ने पहले तो साउथ-सी कंपनी के शेयर बेचकर 7000 डॉलर कमाए। लेकिन उसके कुछ महीने बाद ही चढ़े बाज़ार में 20,000 डॉलर गवां डाले। सोचिए, जिसने तीन अकाट्य नियम दिए, जो ग्रहों की गति की सटीक गणना कर लेता था, वही वैज्ञानिक बाज़ार के मन की सटीक गणना नहीं कर पाया। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी