पांच-छह साल की उम्र तक हमारे आग्रह या मान्यताएं आकार लेना शुरू हो जाती हैं। वे सामाजिक परिवेश से निकलती हैं और उन्हीं को पुष्ट करती हैं। होना तो यह चाहिए था कि शिक्षा व्यवस्था उन्हें हर पल चुनौती देती और सोचने की वैज्ञानिक, तर्कसंगत व वस्तुगत पद्धति विकसित करती। लेकिन अंग्रेज़ों ने भारतीयों की सृजन क्षमता को कुंद करने के लिए जो शिक्षा प्रणाली शुरू की, वही कमोबेश अब भी जारी है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

मान्यताएं हमारे जीवन के हर पहलू में दखल देती हैं रिश्तों व स्वास्थ्य से लेकर बिजनेस, फाइनेंस व ट्रेडिंग तक में। मान्यताएं ऐसे सीधे-सरल विचार हैं जिन्हें हम आंख मूंदकर सच मान लेते हैं। हमें उन पर कोई भी एतराज़ बर्दाश्त नहीं होता, खासकर जब उनका सीधा ताल्लुक हम से हो। मान्यताओं की बुनियाद हमारे महसूस करने की शुरुआत से ही बनने लग जाती है। तभी से बनने लग जाते हैं हमारे आग्रह-पूर्वाग्रह। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

शेयरों के भाव कंपनी के फंडामेंटल्स नहीं, बल्कि उसके फंडामेंटल्स के प्रति लोगों के नज़रिए के आधार पर बदलते हैं। वहीं, शेयर के भावों में कंपनी के प्रति लोगों का नजरिया झलकता है। अगर सकारात्मक नज़रिया है तो वे उसे खरीदते हैं। इस तरह बहुत सारे लोगों के खरीदने से स्टॉक के भाव चढ़ते जाते हैं। नकारात्मक नज़रिया है तो लोगबाग स्टॉक को बेचने लगते हैं तो उसके भाव गिरते चले जाते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

आमतौर पर शेयर बाज़ार के प्रमुख सूचकांकों से ऐसे स्टॉक्स को बाहर किया जाता है जो काफी गिर चुके हैं, इतने ज्यादा कि उनमें और ज्यादा गिरने की गुंजाइश काफी कम होती है। होता यह है कि सूचकांक से निकाले जाने के बाद ऐसे स्टॉक्स सदमे में तात्कालिक रूप से गिर जाते हैं क्योंकि सूचकांक से जुड़े ईटीएफ और म्यूचुअल फंडों को एडजस्ट करने के लिए उन्हें बेचकर नए स्टॉक्स खरीदने होते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सूचकांक के घटकों में बदलाव के लिए बाज़ार पूंजीकरण से लेकर लिक्विडिटी जैसे तमाम मानक बनाए गए हैं। लेकिन हम स्टॉक्स को निकालने या लाने की रणनीति को गहराई से परखें तो स्पष्ट हो जाता है कि निर्धारित मानकों पर ठीक से अमल नहीं किया जाता। अमूमन सूचकांक में ऐसे स्टॉक्स लाए जाते हैं जो पहले से ही काफी चढ़ चुके होते हैं और उनमें ज्यादा बढ़ने की गुंजाइश बहुत कम होती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

सेंसेक्स व निफ्टी भले ही बैंकिंग व फाइनेंस क्षेत्र को तवज्जो देते हों, लेकिन उनके घटक स्टॉक्स को बराबर बदला जाता है। इसके लिए हर छह महीने पर जनवरी व जुलाई में समीक्षा की जाती है। किन स्टॉक्स को निकालना और किनको लाना है, इसका औपचारिक नोटिस चार हफ्ते पहले दे दिया जाता हैं और अमल मार्च व सितंबर के डेरिवेटिव सौदों की एक्सपायरी के बाद के पहले कामकाजी दिन किया जाता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

जिन्हें निफ्टी के फ्यूचर्स व ऑप्शंस में ट्रेड करना है, उनकी बात अलग है। लेकिन जिन्हें समूचे बाज़ार में ट्रेड करना है, उन्हें बाज़ार की नब्ज़ को सही ढंग से समझने के लिए बीएसई-500 और एनएसई-500 पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही जिस क्षेत्र की कंपनी चुनी हो, उसके सूचकांक की दशा-दिशा भी देख लेनी चाहिए। वैसे भी आम ट्रेडर लार्जकैप से कहीं ज्यादा तवज्जो स्मॉल व मिडकैप को देता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सेंसेक्स व निफ्टी के स्वरूप को देखने से साफ हो जाता है कि हम जिन सूचकांकों को अर्थव्यवस्था व सारे शेयर बाज़ार का प्रतिनिधि मानते हैं, वे असल में बैंकिंग व फाइनेंस की ज्यादा नुमाइंदगी करते हैं, अन्य आर्थिक क्षेत्रों की काफी कम। हालांकि कह सकते हैं कि हमारे डीजीपी में सर्वाधिक लगभग 60% योगदान सेवा क्षेत्र का है तो उसमें प्रमुख होने के नाते बैंकिंग व फाइनेंस को तवज्जो देना वाजिब है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

एनएसई के प्रमुख सूचकांक निफ्टी का भी हाल अलग नहीं है। उसमें शामिल 50 स्टॉक्स में बैंक व वित्तीय सेवा का वजन 37.65% है। इसके बाद ऊर्जा का 13.97%, आईटी का 12.59% और उपभोक्ता माल का 10.49% भार है। कंपनियों में सबसे अधिक 10.37% भार एचडीएफसी बैंक का, 7.52% रिलायंस का और 7.26% एचडीएफसी का है। सूचकांक में ऊपर की दस कंपनियों को मिला दें तो उनका ही भार 55.56% बन जाता है। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

बीएसई सेंसेक्स में 30 स्टॉक्स शामिल हैं। इनसे जुड़ी 30 कंपनियों का ही बाज़ार पूंजीकरण स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड सभी 4858 कंपनियों के कुल बाज़ार पूंजीकरण का करीब 42% बनता है। इस मायने में हम मान सकते हैं कि सेंसेक्स पूरे बाज़ार का सही प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन आप शायद यह जानकर आश्चर्य में पड़ जाएं कि सेंसेक्स में बैंकिंग व फाइनेंस क्षेत्र की नौ कंपनियां हैं और उसका कुल वजन 41.38% है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी