बारिश का मौसम। पहले तेल के दीए, अब बिजली के बल्ब जलते हैं। लेकिन पतंगों में ऐसा रसायन होता है कि उन्हें कुछ और ही नज़र आता हैं। वे रौशनी पर टूट पड़ते हैं। दीए/बल्ब को कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन सुबह तक नीचे मृत पतंगों का ढेर लग जाता है। शेयर बाज़ार में रिटेल ट्रेडरों का यही हश्र होता है। बचना है तो उन्हें अपना नौसिखियापन छोड़कर प्रोफेशनलों जैसा हुनर सीखना होगा। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

किताबों या ऑनलाइन वीडियो से ट्रेडिंग सीखने तक तो गनीमत है। लाखों लोगों को लगता है कि वे बिजनेस चैनल देखकर ट्रेडिंग/निवेश में पारंगत हो जाएंगे। लाखों व सालों गंवाने के बाद उन्हें समझ में आता है कि वे मरीचिका में जी रहे थे। ट्रेडिंग में जीत का तुक्का किसी का भी लग सकता है। पर, बराबर जीतना है तो ट्रेडिंग के तर्क-सम्मत नियमों को निरतंर अभ्यास से अपना संस्कार बनाना पड़ता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बहुत आसान है यह कहना कि बाज़ार में प्रोफेशनल ट्रेडर सही वक्त पर एंट्री करते और सही वक्त पर निकलते हैं, जबकि नौसिखिया/रिटेल ट्रेडर गलत वक्त पर एंट्री और गलत वक्त पर बाहर निकलते हैं। अहम सवाल यह है कि इस गलत को सही करने का रास्ता क्या है? बहुत-से लोगों को लगता है कि कुछ किताबें पढ़ ली जाएं, ट्रेडिंग पर कुछ ऑन-लाइन वीडियो देख लिए जाएं तो सही रास्ता मिल जाएगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

मन को नकारात्मक व नुकसानदेह मान्यताओं या धारणाओं के मुक्त करने के एक नहीं, अनेक तरीके हैं। मूल बात है कि इन्हें हमें अपने अंदर देखना होगा। इन्हें देखना भर है। न इनसे जुड़ाव रखना है, न दुराव। इतना करते ही इनका मिटना शुरू हो जाएगा। एक दिन चेतन और अवचेतन मन के बीच की लौह दीवार टूट जाएगी और मन पूरी ताकत से खिल उठेगा। लेकिन यह काम आपको खुद करना होगा। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

धीरे-धीरे पुरानी मान्यताएं पीछे हटती जाती हैं और उनकी जगह ट्रेडिंग का वस्तुपरक नज़रिया लेने लगता है। हमें कभी-कभी आंखें बंदकर इस नए नज़रिए को आकार लेते महसूस करना चाहिए। पुराने के जाने और नए के आने को अनुभूति पर कसना चाहिए। इस तरह हम अपने अवचेतन मन को ट्रेन करते जाते हैं। याद रखें कि अवचेतन मन हमारी 95% क्रियाओं व सोच को कंट्रोल करता है, जबकि चेतन मन मात्र 5% को। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

अपनी ही मान्यताओं को दृष्टा भाव से देखने पर धीरे-धीरे हमारे अंदर ‘जो जैसा है, उसे वैसा ही’ देखने की दृष्टि विकसित होने लगती है। यही वह मुकाम है जहां पहुंचते ही आपको ट्रेडिंग के नियम लिखकर रख लेने चाहिए, चाहे वह स्टॉक के चयन से जुड़ा हो, स्टॉप-लॉस या पोजिशन साइज़िंग से जुड़ा हो या टेक्निकल एनालिसिस के कुछ सकेतकों का पालन करना हो। मान्यताओं को सिर उठाते ही नियमों पर कसें। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

घर-परिवार व समाज से मिली मान्यताएं ट्रेडरों की सोच से लेकर कर्म तक को बांध देती हैं। वे न मुक्त रूप से विश्लेषण कर पाते हैं और न ही सही तस्वीर देख पाते हैं। खुद को नुकसान पहुंचाने के कदम उठाते हैं। वे इससे निकलने के लिए किताबें बढ़ते हैं, अभ्यास करते है, खुद से बार-बार वादा करते हैं कि आगे से गलती नहीं करेंगे। लेकिन पुरानी मान्यताएं उन्हें पटकती रहती है। अब सोम का व्योम…और भीऔर भी

बचपन से बनती मान्यताओं व धारणाओं से हमारी आंतरिक मनोवैज्ञानिक संरचना तैयार होती है। वही हमारे हर व्यवहार को नियंत्रित करती है। मन में गांठ है कि कभी हारना नहीं है तो ट्रेडर पहले से तय स्टॉप-लॉस खिसका जाता है। उसका रिस्क बढ़ता जाता है। फिर भी हार मानना उसे गवारा नहीं क्योंकि ऐसा करने से वो गलत साबित हो जाएगा। लेकिन हमेशा जीतने की मान्यता अंततः उसे घाटे में डुबा डालती है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

हमारी मान्यताएं आमतौर पर अतार्किक व नकारात्मक होती हैं। वे तथ्यों से मेल नहीं खातीं। फिर भी हम उनसे चुम्बक की तरह चिपके रहते हैं क्योंकि वे हमारे अवचेतन मन में गहरी पैठ बना चुकी होती हैं। हमारा सचेतन मन कितनी भी कोशिश कर ले, फैसला लेते वक्त अवचेतन मन ही निर्णायक साबित होता है। हम खूब सारी किताबें पढ़ते हैं, नए-नए लेख पढ़ते हैं। लेकिन मौका पड़ने पर कुछ काम नहीं आता। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

हम अपनी मान्यताओं के प्रतिकूल पड़नेवाले अनुभवों को ठुकराते और अनुकूल पड़नेवाले अनुभवों को स्वीकार करते जाते हैं। धीरे-धीरे मान्यताएं हमारी ऐसी प्रोग्रामिंग व कंडीशनिंग कर देती हैं कि हम दुनिया को खुली आंखों से देखने के बावजूद उन्हें मान्यताओं की नज़र से समझने लगते हैं। सच्चाई दूर खड़ी हमारा मुंह चिढ़ाती रहती है और हम समझ ही नहीं पाते कि हम हर काम में बराबर नाकाम क्यों होते जा रहे हैं। अब आजमाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी