ग्लोबल बनी दुनिया का दुष्प्रभाव है कि अमेरिका और चीन के व्यापार-युद्ध का प्रभाव भारत समेत सभी देशों पर पड़ता है। यह हमारे शेयर बाज़ार पर लगी साढ़े-साती का एक प्रमुख तत्व है। इस साल मार्च से ट्रम्प ने इसका बिगुल बजाया और अब दोनों देश एक दूसरे के उत्पादों पर शुल्क बढ़ाने में लगे हुए हैं। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा आयातक है तो उसका शुल्क बढ़ाना ज्यादा ही मारक होता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय बाज़ार से निवेश निकाल भागते जा रहे हैं। इससे भारतीय रुपया कमज़ोर पड़ता गया और डॉलर 75 रुपए के करीब जा पहुंचा। उधर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ते जा रहे हैं। भारत अपनी ज़रूरत का 83% कच्चा तेल आयात करता है तो उसे खरीदने के लिए डॉलर की मांग बढ़ती गई जिससे रुपया और ज्यादा कमज़ोर होता जा रहा है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

रिजर्व बैंक ने भले ही शुक्रवार को रेपो व रिवर्स रेपो दर को 6.50% और 6.25% पर अपरिवर्तित रखा। लेकिन भारत से लेकर अमेरिका तक में ब्याज दरें बढ़ रही हैं। अपने यहां सरकारी बांडों पर यील्ड की दर 8-8.5% चल रही है, जबकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने अभी हाल में पिछले तीन सालों में आठवी बार ब्याज दर बढ़ाकर 2-2.25% कर दी और आगे चार बार फिर बढ़ाने का संकेत दे दिया। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

देशी-विदेशी संस्थाओ की खींचतान, एलआईसी पर बढ़ता बोझ और सिस्टम में नकदी के संकट की आशंका। ये हुए ढाई कारक, जिन्होंने इस वक्त भारतीय शेयर बाज़ार को मथ रखा है। ज्योतिष की भाषा में इस ढय्या कह सकते हैं। साढ़े साती में से ढाई कारक निकल गए तो बाकी बचे पांच कारक। कारक नहीं, बल्कि इन्हें अनिश्चितता कहा जाना चाहिए। पहली अनिश्चितता यह है कि आठ महीने बाद मोदी सरकार रहेगी या नहीं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

इंफ्रास्ट्रक्चर व हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों ने कमर्शियल पेपर जैसे ऋण-प्रपत्रों में हाल में जिस तरह डिफॉल्ट किया, उससे डर लगा कि कहीं सिस्टम में नकदी का संकट न पैदा हो जाए। बैंकों के बढ़ते एनपीए का संकट पहले से था। सरकार एलआईसी पर आईडीबीआई बैंक का बोझ डाल चुकी है। वैसे, आईएल एंड एफएस में सत्यम की तरह नया निदेशक बोर्ड बना दिया गया है। पर, एलआईसी को ही उसका उद्धार करना होगा। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार में ज्वार-भाटे जैसे स्थिति है। निफ्टी 150 से 200 अंकों का उतार-चढ़ाव झेल रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि जहां विदेशी निवेशक संस्थाएं बराबर बेच रही हैं, वहीं म्यूचुएल फंड व बीमा कंपनियों जैसी देशी निवेशक संस्थाएं बराबर खरीद रही है। इनके बीच का असंतुलन बाजार में असामान्य हलचल का सबब बन जा रहा है। ऊपर से आईएल एंड एफएस जैसी कंपनियों के डिफॉल्ट ने परेशानी बढ़ा रखी है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार की हालत इन दिनों डांवाडोल चल रही है। सुबह का जोश शाम तक ठंडा पड़ जाता है। दरअसल अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति ने इधर बाज़ार को ज़मीन पर उतारना शुरू कर दिया है। लगता है कि जैसे उस पर नकारात्मक तत्वों की साढ़े साती सवार हो गई हो। इस साढ़े साती के काल्पनिक नहींं, सचमुच के कारक हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उन्हें सुलझाना भी कतई आसान नहीं। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

ज्ञान को सफलता तक कौशल पहुंचाता है और कौशल के लिए अभ्यास ज़रूरी है। अभ्यास भी जहां-तहां हाथ मारने का नहीं, बल्कि अनुशासन व नियम में बंधकर चलने का। जिस तरह जीवन सांसों की डोर से बंधा है, उसी तरह वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग भावों की लय-ताल से बंधी है। भावों की यह डोर पकड़कर हम अभ्यास करते हैं। धीरे-धीरे भावों का पैटर्न और रुख बदलने का ढर्रा समझ में आने लगता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

लंबे निवेश के लिए फंडामेंटल एनालिसिस का सहारा लेना चाहिए, टिप्स का कभी नहीं। ट्रेडिंग के लिए टेक्निकल एनालिसिस की मूल बातों को जान लेना चाहिए। लेकिन बाज़ार में देशी व विदेशी संस्थाओं और नवसिखिया रिटेल ट्रेडरों का संतुलन समझना ज़रूरी है ताकि हम पतंगों की तरह दीए की लौ पर जल जाने के अंजाम से बच सकें। संस्थाओं की राह ही सही राह है। ट्रेडिंग में सफलता की बुनियादी समझ यही है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार में खिलाड़ियों के खेल और संतुलन को जानने के साथ ही यह बात मन में कहीं गहरे बैठा लेना चाहिए कि  ट्रेडिंग और निवेश मूलतः प्रायिकता के खेल हैं। यहां कुछ भी पक्का नहीं। अनुमान व संभावना चलती है। आंख मूंद छलांग लगाने से सबसे अच्छा पाने की उम्मीद आत्मघाती है। शेयर बाज़ार में अच्छी तरह गिना व समझा गया रिस्क लिया जाता है, जिसमें रिटर्न की प्रायिकता कभी शत-प्रतिशत नहीं होती। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी