वीआईएक्स सूचकांक की अहमियत बहुत कम लोग समझते हैं। जो समझते भी हैं, वे गलत समझते हैं। मसलन, इसको लेकर गलत धारणा यह है कि इसके कम रहने पर बाज़ार में भारी बिकवाली आ सकती है। वहीं, इसका 40 से ज्यादा होना दिखाता है कि बाज़ार तलहटी पकड़ चुका है और अब ज्यादा नहीं गिर सकता। दुनिया में नब्बे के दशक से अब तक का अनुभव उक्त धारणा को गलत साबित करता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

इंडिया वीआईएक्स सूचकांक का स्तर अपने यहां पिछले 52 हफ्तों में 24.03 से 9.43 के बीच डोलता रहा है। फिलहाल यह 15 से 18 के बीच चल रहा है। वीआईएक्स असल में शिकागो बोर्ड ऑप्शंस एक्सचेंज का ट्रेडमार्क है और उसी से एनएसई ने इसे इस्तेमाल करने का लाइसेंस लिया है। अगर यह सूचकांक 40 के ऊपर चला जाए तो जबरदस्त बिकवाली चलती है और पुट ऑप्शंस का प्रीमियम बहुत बढ़ जाता है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार जब गिर रहा होता है, तब पुट ऑप्शंस की मांग बढ़ जाती है। चूंकि उस दौरान कॉल ऑप्शंस (तय तारीख व तय भाव पर खरीदने का अधिकार) को खरीदनेवाले कम और पुट ऑप्शंस को खरीदनेवाले ज्यादा होते हैं, इसलिए इंडिया वीआईएक्स बढ़ जाता है। यह सूचकांक अगर 15 से नीचे रहे तो माना जाता है कि बाजार में एक तरह की स्थिरता व संतोष है, जबकि 25 तक जाना खतरनाक है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

निवेशकों या ट्रेडरों को अगर लगता है कि शेयर बाज़ार में रिस्क बढ़ रहा है और गिरावट की आशंका ज्यादा है तो वे रिस्क से बचने के लिए पुट ऑप्शन खरीदते हैं जिसमें उन्हें अपने शेयर पहले से तय तारीख और भाव पर बेचने का अधिकार मिला रहता है। ये सौदे अमूमन महीने भर में एक्सपायर हो जाते हैं। ऑप्शन सौदे उनकी होल्डिंग के लिए किसी बीमा पॉलिसी की तरह काम करते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की लहरों के ज़ोर व रुझान को पकड़ने के लिए ट्रेडर कई संकेतकों का इस्तेमाल करते हैं। कुछ ट्रेडर निफ्टी के स्प्रेड या दायरे को महत्व देते हैं। लेकिन बैकों, संस्थाओं व प्रोफेशनल ट्रेडरों के बीच सबसे खास व अहम संकेतक है वोलैटिलिटी इंडेक्स या इंडिया वीआईएक्स। यह सूचकांक निफ्टी-50 के ऑप्शंस (पुट और कॉल) में निहित चंचलता को नापता है। इसे बाज़ार में छाए डर का पैमाना भी मानते हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार में छोटे-बड़े जो भी निवेशक या ट्रेडर भाग लेते हैं, उनके पास थोड़ी-बहुत मात्रा में शेयर ज़रूर होते हैं। इसलिए बाज़ार में जब डर छाता है और बिकवाली चलने लगती है, तब हर कोई अपने शेयर बेचकर निकल लेना चाहता है। उस दौरान बहुत ही कम लोग होते हैं जो खरीदने का जोखिम उठाते हैं। बेचने की आतुरता ज्यादा और खरीदने की लालच बेहद कम। सप्लाई ज्यादा, मांग कम। नतीजा भारी गिरावट। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

आमतौर पर शेयर बाज़ार धीरे-धीरे ऊपर उठता है। बढ़त के दौरान उतना ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं होता। लेकिन गिरते वक्त उसकी रफ्तार कहीं ज्यादा होती है। अध्ययन बताते हैं कि बाज़ार जिस गति से बढ़ता है, उसकी तीन गुना गति से गिरता है। इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला, डर की भावना लालच की बनिस्बत कहीं ज्यादा ताकतवर होती है। दूसरा कारण यह कि बाज़ार में खरीदने की तुलना में बेचना आसान होता है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार और अलग-अलग शेयरों के भाव लहरों में चलते हैं। फिर, इन लहरों की तीन चाल होती है। ऊपर, नीचे या सीमित दायरे में भटकती कमोबेश सीधी रेखा। ट्रेडिंग में बाज़ार की इसी स्वभाव से कमाया जाता है। लहर के निचले स्तर पर खरीदना, ऊपरी स्तर पर बेचना। शॉर्ट-सेलिंग में इसका उल्टा। समय का कोई भी फ्रेम चुने, एक दिन, कई दिन, सप्ताह या महीने। ट्रेडिंग से कमाने का यही सलीका है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाजार की बुनियादी संरचना ही ऐसी है कि वह हमेशा लंबे समय में ऊपर जाता है। खासकर भारत जैसे संभावनाओं से भरे विकासशील देश के लिए तो यह अमिट सच्चाई है। सबको डर है कि अगर मोदी सरकार मई में लोकसभी चुनाव जीतकर दोबारा नहीं लौटी तो शेयर बाज़ार पटरा हो जाएगा। हो सकता है कि ऐसा होने पर बाज़ार को हफ्ते-दस दिन का झटका लगे, लेकिन वह फिर कुलांचे मारने लगेगा। अब शुक्रवार अभ्यास…और भीऔर भी

बाज़ार का स्वभाव बड़ा विचित्र है। जब तमाम मूलभूत कारक बता रहे होते हैं कि कोई स्टॉक या पूरा शेयर बाजार उठने जा रहा है, तभी वह अचानक डूब जाता है। यहां हर गणना फेल है। बाज़ार का यह मनमानापन समझने के लिए हर ट्रेडर को नासिम निकोलस तालेब की किताब ‘ब्लैक स्वान’ ज़रूर पड़नी चाहिए। तालेब ने वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग के दशकों के गहरे अनुभव को निचोड़कर यह किताब लिखी है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…और भीऔर भी