दौलत वाले हमेशा अपने फायदे की सोचते हैं। वे घाटे से दूर भागते हैं। इसलिए समीकरण लाख बताएं कि शेयर का भाव यहां से ऊपर जानेवाला है। लेकिन महीनों के इंतज़ार के बाद खरीदी के पुराने स्तर पर आते ही वे अपने शेयरों को बेचकर निकल जाते हैं। ज्यादा घाटे से उन्हें नो-प्रॉफिट, नो-लॉस पर निकल लेना ही बेहतर लगता है। यही मानसिकता हमें चार्ट पर रेजिस्टेंस के रूप में नज़र आती है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार कभी इसलिए नहीं गिरता कि वहां धन लगानेवालों की कमी हो जाती है। बड़े व समझदार निवेशक रिस्क बढ़ने पर शेयरों के बजाय अपना धन कैश या लिक्विड फंड में ज्यादा रखने लगते हैं। उन्हें कम से कम रिस्क में ज्यादा से ज्यादा रिटर्न चाहिए होता है। उनके धन को प्रोफेशनल लोगों की टीम संभालती है। वे सोने से लेकर सरकारी बांडों व म्यूचुअल फंडों तक में निवेश फैलाकर रखते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

हमारे गांवों में पीने के पानी का गंभीरतम संकट है। कहीं-कहीं हज़ारों लोग ‘साफ पानी दो, नहीं तो मौत दो’ के नारे के साथ अनशन करने लगे हैं। कमाल है कि अपने यहां पानी की किल्लत हो सकती है, लेकिन शेयर बाज़ार के छोटे से क्लब में धन का संकट कभी नहीं आता। वहां धन लगाने के लिए देशी अमीर और संस्थाएं ही नहीं, विदेशी अमीर और एफआईआई तक लाइन लगाए पड़े हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार में धन के इधर-उधर फंस जाने की मुश्किल आ सकती है। जैसे आईएल एंड एफएस प्रकरण के बाद एनबीएफसी को लिक्विडिटी का संकट झेलना पड़ रहा है। लेकिन अपने यहां धन के अभाव का संकट कभी नहीं आ सकता। भारत में दुनिया के तीसरे सबसे ज्यादा डॉलर अरबपति हैं। अमेरिका व चीन के बाद भारत का ही नंबर आता है। ऊपर से नेताओं व अफसरों की अरबों-खरबों की अघोषित संपत्ति। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बजट कितना कारगर होगा, यह कम से कम एक साल बाद पता चलेगा। लेकिन शेयर बाज़ार के लिए तो वह हफ्ते भर में ही इतिहास बन चुका है। ट्रेडर और निवेशक अब बजट के प्रस्तावों से बाहर निकलकर अन्य मसलों पर गौर करने लगे हैं। जैसे, कंपनियों के तिमाही नतीजे, दुनिया में चल रहे व्यापार युद्ध, मध्य-पूर्व में बढ़ता तनाव और अलग-अलग उद्योगों की स्थिति क्या चल रही है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

साल 2022 में जब देश आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा होगा, तब तक किसानों की आय ही नहीं, कृषि निर्यात तक दोगुना कर दिया जाएगा। लेकिन कैसे? सीतारमण भजते रहो! वे चाहतीं तो देश में 560 लाख करोड़ रुपए की संपदा रखने वाले अरबपतियों पर 1% वेल्थ टैक्स लगाकर 5.6 लाख करोड़ और उत्तराधिकार टैक्स से 9.3 लाख करोड़ जुटा सकती थीं। लेकिन उन्होंने अमीरों पर सरचार्ज से जुटाए केवल 2724 करोड़! अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बजट में भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास का सारा भार देशी नहीं, विदेशी पूंजी पर डाल दिया गया है। शेयर बाज़ार में पूंजी लगानेवाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए केवाईसी नियम आसान कर दिए गए हैं। मेक-इन इंडिया भले ही पिछले पांच सालों में सफल न हुआ था, लेकिन विदेशी पूंजी को मैन्यूफैक्चरिंग में खींचने का दावा है। ऊपर से भारत सरकार खुद पहली बार संप्रभु बांड से विदेशी ऋण जुटाने जा रही है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सब्ज़बाग को सब्ज़बाग कहना निराशावाद नहीं होता। पर प्रधानमंत्री मोदी 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था को सब्ज़बाग कहनेवालों को पेशेवर निराशावादी बता रहे हैं। मसला यह है कि यह लक्ष्य मोदी सरकार के नए कार्यकाल के आखिरी साल 2023-24 का नहीं, बल्कि उसके एक साल बाद का है। इसलिए लक्ष्य अधूरा रहा तो कह सकते हैं कि अभी तो एक साल बाकी है। दूसरे, 8% की विकास दर से इसकी गिनती गलत है। अब मंगल की दृष्टि..औरऔर भी

हमारी अर्थव्यवस्था इस साल 12% बढ़ी और 4% महंगाई घटा दें तो जीडीपी की वास्तविक विकास दर 8% रहेगी। अगले पांच साल भी इसी दर से जीडीपी बढ़ा तो वित्त वर्ष 2024-25 तक हमारी अर्थव्यवस्था 2.7 ट्रिलियन डॉलर के वर्तमान स्तर से बढ़कर 5 ट्रिलियन डॉलर की हो जाएगी। लेकिन एक्सेल शीट की गणना के मुताबिक 8% की दर से तब तक अर्थव्यवस्था 4.28 ट्रिलियन डॉलर ही होगी। बजट का लक्ष्य राम भरोसे। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था से लेकर शेयर बाज़ार तक के लिए साल का सबसे महत्वपूर्ण दिन। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लोकसभा में 11 बजे बजट भाषण पेश करेंगी। जीएसटी लागू होने के बाद कर-प्रस्तावों का बहुत महत्व नहीं रह गया है। इसलिए सबकी निगाहें इस बात पर होंगी कि वे अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए क्या कदम उठाने जा रही हैं। बाज़ार यह देखेगा कि वे एनबीएफसी के तरलता संकट को कैसे दूर करती हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी