म्यूचुअल फंड इक्विटी के बजाय बांड भी ज्यादा धन लगा रहे हैं। एनपीए के बोझ से दबे बैंक भी बिगड़े माहौल में शेयर बाज़ार में निवेश से दूर हैं। फिर आखिर कौन-सी देशी संस्थाएं हैं जो बाज़ार में निवेश बढ़ा रही हैं? जानकारों की मानें तो पिछले कुछ महीनों में शेयर बाज़ार में अधिकांश खरीद एलआईसी ने की है। स्वेच्छा नहीं, बल्कि सरकार के दबाव में। सरकार ने उसको मोहरा बना रखा है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बजट के बाद शेयर बाज़ार में म्यूचुअल फंडों का रुख क्या रहा है, इसका तो ठीकठीक पता नहीं। लेकिन ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक बीते अगस्त माह में इनमें कुल 1.02 लाख करोड़ रुपए का निवेश आया है। इसमें से 79,000 करोड़ से ज्यादा धन उनकी लिक्विड या अल्पकालिक बांड स्कीमों में लगा है, जबकि मात्र 9090 करोड़ रुपए इक्विटी स्कीमों में। यह शेयर बाज़ार से आम निवेशकों की बढ़ती बेरुखी को दिखाता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

देशी निवेशक संस्थाएं विदेशी संस्थाओं या एफआईआई से ज्यादा खरीद रही हैं। फिर भी शेयर बाज़ार गिरता जा रहा है। कारण यह कि एफआईआई ही बाज़ार का सेंटीमेंट तय करते हैं। उनके बेचने पर ब्रोकरों से लेकर रिटेल निवेशक तक बेचने लगते हैं। म्यूचुअल फंड भी अमूमन ऐसे दौर में बेचते हैं क्योंकि उनमें रिटेल निवेशकों का ही धन जमा होता है और उनके रिडेम्पशन की मांग उन्हें बेचकर पूरी करनी पड़ती है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) जुलाई से अब तक भारतीय शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट से 34,275 करोड़ रुपए निकाल चुके हैं। बजट के दिन से लेकर अब तक के दो महीने में निफ्टी 8.38% गिर चुका है। वह भी तब, जब जुलाई से अब तक देशी निवेशक संस्थाओं (डीआईआई) ने कैश सेगमेंट में एफपीआई से ज्यादा 45,791 करोड़ रुपए डाले हैं। ऐसा न हुआ होता तो बाज़ार न जाने कितना गिर गया होता! अब सोम का व्योम…औरऔर भी

राजनीति में झूठ और अहंकार चलता है। लेकिन अर्थनीति में यह रवैया सत्यानाश कर डालता है। जून 2019 की तिमाही में हमारा जीडीपी मात्र 5% बढ़ा है। यह 25 तिमाहियों की न्यूनतम विकास दर है। चीन का जीडीपी इसी दौरान 6.2% बढ़ा है तो सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हम नहीं रहे। सरकारी मंत्री दावा कर रहे हैं कि हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, जबकि हम सातवें नंबर पर हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

अकेले शेयर बाज़ार में घबराहट होती तो संभल जाती। दिक्कत यह है कि सरकार तक घबराई हुई दिख रही है। लगता है कि उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। रिजर्व बैंक से 1.76 लाख करोड़ रुपए का सरप्लस खींचना और दस सरकारी बैंकों को मिलाकर चार बैंक बनाना यही संकेत देता है। जब चहुंओर आर्थिक सुस्ती का आलम हो और व्यापार-युद्ध के बीच वैश्विक अनिश्चितता बढ़ रही हो, तब इसका क्या औचित्य था! अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

इधर कई सालों से मुद्रास्फीति कम चल रही है। इससे आम लोगों की बचत बढ़नी चाहिए थी। लेकिन हाउसहोल्ड बचत बीते दस साल में जीडीपी के 23.6% से घटकर 17.2% पर आ गई, जबकि इनकी देनदारियां बेतहाशा बढ़ गई हैं। लोगबाग कर्ज लेकर अपनी खपत का इंतज़ाम कर रहे हैं। 2015-16 से 2017-18 तक के मात्र दो साल में उनका कर्ज 3.85 लाख करोड़ से लगभग दोगुना 7.41 लाख करोड़ रुपए हो गया। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

रिजर्व बैंक बराबर ब्याज दर घटा रहा है। फिर भी इस साल अप्रैल-जून की तिमाही में कॉरपोरेट क्षेत्र को 22.16% ज्यादा ब्याज अदा करना पड़ा। ये आंकड़ा 2179 कंपनियों के सैम्पल पर आधारित है। इन कंपनियों का शुद्ध लाभ इस दौरान 11.97% घट गया तो उन्होंने सरकार को 10.48% कम टैक्स दिया। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें उद्योग से लेकर उपभोक्ता और सरकार, सभी के सभी फंसे हुए नज़र आ रहे हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

आर्थिक विकास के चार इंजिन होते हैं। सरकारी खर्च, निजी निवेश, निजी खपत और निर्यात। इन चारों इंजिनों की हालत बड़ी संगीन दिख रही है। सरकार को टैक्स भरपूर नहीं मिल रहा तो वह खर्च कहां से बढ़ाएगी। उधार के लिए विदेश की शरण लेने तक की पेशकश हो चुकी है। विश्व अर्थव्यवस्था में मंदी के आसार हैं तो हम निर्यात बढ़ा नहीं सकते। बचा निजी निवेश और खपत तो वहां भी सन्नाटा! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अगर खुदा-न-खास्ता अमेरिका में मंदी आती है तो पूरी दुनिया पर इसका असर पड़ेगा। चीन, जापान व यूरोप में पहले से कमज़ोरी चल रही है। ऐसा होने पर भारतीय निर्यात के बढ़ने की रही-सही आशा भी खत्म हो जाएगी। वैसे भी अपना निर्यात सुस्ती का शिकार हो चुका है। चालू वित्त वर्ष 2019-20 से अप्रैल-जुलाई के पांच महीनों में यह साल भर पहले की समान अवधि की तुलना में मात्र 3.13% बढ़ा है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी