पहली बात। नोट बनाए नहीं, कमाए जाते हैं। नोट किसी देश का केंद्रीय बैंक बनाता है। उसमें भी मूल्य बाज़ार डालता है, वो नहीं। दूसरी बात। ट्रेडर के लिए अनुशासन, जोखिम की क्षमता और गिनती में दक्षता के अलावा तीन जरूरी चीज़ें हैं नियंत्रित मन, व्यवस्थित धन व समयसिद्ध पद्धति। मन को स्थितिप्रज्ञ बनाना पड़ता है। धन कितना भी हो, उसे सही तरीके से लगाना चाहिए। पद्धति को बराबर मांजना होता है। अब देखें आज का बाज़ार…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश करना मुश्किल नहीं। अच्छी कंपनी चुनो और धन लगाकर निश्चिंत हो जाओ। पर सफल ट्रेडर बनना हर किसी के बूते की बात नहीं। इसके लिए जोखिम उठाने की कुव्वत, अनुशासन और गिनती में पक्का होना जरूरी है। सिगरेट जैसी लत न छोड़ पाने वाला, हर दमड़ी को दांत से दबाने वाला या सरल गुणा-भाग में चकराने वाला शख्स कभी भी अच्छा ट्रेडर नहीं बन सकता। सोच लें आप। हम बना लें आज की रणनीति…औरऔर भी

यह डर और अंधकार का दौर है। यहां बिंदास वही रह सकता है जो सारा कुछ नहीं तो बहुत कुछ जानता है या भयंकर मूर्ख है। जब हर तरफ बीमारी, असहिष्णुता, भ्रष्टाचार, हिंसा और अन्याय का बोलबाला है तो कोई सहज जीवन कैसे जी सकता है? हर ऊपरी परत निचली परत को अंधेरे में रखती है। सुखद यह है कि लोग अब अज्ञान की इस चादर को चिंदी-चिंदी करने लगे हैं। खैर! बनाते हैं आज की ट्रेडिंगऔरऔर भी

महीने का आखिरी गुरुवार। डेरिवेटिव सौदों के सेटलमेंट का दिन। यह भारतीय शेयर बाज़ार में ऑपरेटरों का दिन होता है। वे घात लगाकर शिकार करते हैं। शिकार एकदम नज़दीक आ जाए। उसे कोई खटका न लगे। जब वो पूरी तरह निश्चिंत हो जाए तो हमला करके उसे चिंदी-चिंदी कर दो। सालों-साल से यही होता आया है। कल भी यही हुआ। बाज़ार बंद होने के 45 मिनट पहले खेल शुरू हुआ और देखते ही देखते सारा सीन बदलऔरऔर भी

धीरे-धीरे यह सेवा लेनेवालों की संख्या बढ़ रही है तो हल्की-सी घबराहट के साथ जिम्मेदारी और जवाबदेही का भाव भी बढ़ता जा रहा है। जब लोग आप पर भरोसा करने लगे तो उनके प्रति आपकी जवाबदेही बढ़ जाती है। अपनी तरफ से सच्ची सेवा देने का संकल्प है। लेकिन एक बात गांठ बांध लें कि मैं या कोई दूसरा आपको पैसे बनाकर नहीं देगा। पैसे के मामले में किसी की नहीं, सिर्फ अपनी सुनें। अब टिप्स आजऔरऔर भी

कल एक प्रोफेशनल ट्रेडर से मिला। उनका कहना था कि पिछले छह सालों के सफल करिअर में उनका औसत स्ट्राइक रेट 55-65% तक रहा है। यह अपने-आप में एक मानक है। लेकिन वे हर सौदे में 3% कमाने की गुंजाइश और 1% ही गंवाने की गुंजाइश लेकर चलते हैं। अगर महीने के दस सौदों में से पांच गलत और पांच सही निकले तो उनका घाटा 5% होता है, जबकि फायदा 15% होता है। अब देखें आज काऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में हर खरीदनेवाले के सामने एक बेचनेवाला होता है। तभी सौदा होता है, लिक्विडिटी आती है। पहला सोचता है कि आगे बढ़ेगा तो अभी खरीद लो। दूसरा सोचता है कि आगे गिरेगा तो अभी बेच डालो। हेड या टेल। उछालने पर दो में से एक ही आएगा। प्रायिकता 50-50% है तो क्या ट्रेडिंग सिक्का उछालने जैसा खेल है? नहीं। यह इंसानी अपेक्षाओं का खेल है। प्रायिकता 75-25% भी हो सकती है। देखते हैं आज काऔरऔर भी

इंसान की फितरत है कि वो हमेशा सही होना चाहता है। गलत होने से घनघोर घृणा करता है। लेकिन यह फितरत ट्रेडिंग और निवेश की दुनिया में नहीं चलती। यहां का अकाट्य सत्य है कि नुकसान हर किसी को उठाना पड़ेगा। चार ही बातें हो सकती हैं: बड़ा लाभ, छोटा लाभ, बड़ा नुकसान, छोटा नुकसान। इसमें हमें बस बड़े नुकसान से बचने का तरीका खोजना है। बाकी तो वक्त का फेरा है। उतरते हैं आज के मैदानऔरऔर भी

कुछ लोग फाइनेंस को जमकर गरियाते हैं। कहते हैं कि यह तो बैठे-ठाले दूसरों की जेब ढीली करने का धंधा है, जबकि है यह उद्यमियों की प्रतिभा व मेहनत से हासिल कमाई में हिस्सेदारी का ज़रिया। शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग भी खुद को खोजने जैसी यात्रा है। जोखिम से नहीं डरते; कूदकर फलों को लपकने में मज़ा आता है; अध्ययन, अनुशासन व मेहनत का मन है तो कामयाब होंगे। कल की हिट टिप्स के बाद बात आजऔरऔर भी

लोकतंत्र में कोई भी नीति संबंधी मानक आमजन के लिए अप्रासंगिक नहीं होना चाहिए। अगर वो अप्रसांगिक है तो तय मानिए कि उस लोकतंत्र से लोगों को सायास बाहर रखा गया है। मुद्रास्फीति के कल आए आंकड़े ने यही साबित किया है। सरकार, वित्त मंत्री, उसके संत्री तक चहक रहे हैं कि मार्च में मुद्रास्फीति घटकर 6% से नीचे आ गई है। हम-आप पूछ रहे हैं कि अच्छा! घट गई? कब कैसे? शेयर बाज़ार ने ऐसा नहींऔरऔर भी