रुपया डॉलर के मुकाबले इस साल 9.27% गिर चुका है। सोमवार को 61.21 की ऐतिहासिक तलहटी छूने के बाद 60.62 पर बंद हुआ। हर तरफ हाहाकार है कि रसातल में जाता रुपया अब संभाला नहीं जा सकता और वो अपने साथ अर्थव्यवस्था और शेयर बाज़ार को भी डुबा देगा। पर सच यह है कि उसकी कमज़ोरी ही एक दिन मजबूती का सबब बनेगी। आयात घटेंगे, निर्यात बढ़ेंगे, रुपया सबल होगा। इस चक्र को समझते, बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

मैं गलत कैसे हो सकता हूं? एक-न-एक दिन साबित हो जाएगा कि मैंने जो फैसला लिया, वो कितना सही था। कुछ ऐसा ही सोचकर हम पुराने फैसलों से चिपके रहते हैं और अपने सही होने का इंतज़ार करते हैं। वक्त सरकता जाता है, पर हमें सही साबित करने का वक्त कभी नहीं आता। जीवन में यह सोच भले चल जाए, लेकिन शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से चिपक जाए तो बरबाद कर डालती है। अब आज का अध्याय…औरऔर भी

शेयर बाज़ार 99% मौकों पर 99% लोगों को चरका पढ़ाता है। इसलिए बाकी 1% लोगों में शामिल होना और 1% सीमित मौकों को पकड़ना बेहद कठिन है। जीवन में आशावाद आगे बढ़ने का संबल बनता है, वहीं शेयर बाज़ार में निराशावाद कामयाबी की बुनियाद बनता है। हर सौदे के पहले सोचना चाहिए कि इसमें कितना घाटा संभव है, जबकि हम यही सोचते हैं कि इससे कितना फायदा कमा सकते हैं। अब करें सोच को पलटने का अभ्यास…औरऔर भी

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) की शुरुआत जब 3 जुलाई 1990 को हुई, तब निफ्टी 279 पर था। 23 साल बाद तमाम उतार-चढ़ावों के बाद बावजूद 3 जुलाई 2013 को निफ्टी 5771 पर बंद हुआ। सालाना चक्रवृद्धि दर निकालें तो निफ्टी में लगा धन इन 23 सालों में हर साल 14.08% बढ़ा है। एफडी पर टैक्स के बाद रिटर्न 6-7% से ज्यादा नहीं बनता। शेयर बाज़ार में लंबे समय के निवेश का यही फायदा है। ध्यान दें किऔरऔर भी

नोट छापना आसान है, कमाना नहीं। वरना हर कोई शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से जमकर कमा रहा होता। आम सोचवालों के लिए ट्रेडिंग से कमाई शेर के जबड़े से शिकार निकालने जैसा काम है। सामने बैठे हैं उस्तादों के उस्ताद, जो भीड़ की हर मानसिकता का इस्तेमाल बखूबी करते हैं। अक्सर कम सतर्क लोगों को छकाने के लिए झांसा/ट्रैप बिछाते हैं जो दिखता है शानदार मौका, लेकिन फंसाते ही निगल जाता है। अभी क्या है इनका ट्रैप…औरऔर भी

ट्रेड में घुसते ही स्टॉप-लॉस लगाना जरूरी है। शेयर अनुमानित दिशा में उठने लगे तो स्टॉप-लॉस को उठाते जाएं। अगर शॉर्ट-सेल किया है और शेयर लक्ष्य की दिशा में गिरने लगे तो स्टॉप-लॉस को नीचे ला सकते हैं, लेकिन कभी भी ऊपर न करें। इसी तरह लांग सौदों में स्टॉप-लॉस को उठा तो सकते हैं, लेकिन कभी भी नीचे न लाएं। सौदे को और मोहलत देने की सोच सिर्फ-और-सिर्फ हराती है। अब रुख आज के बाज़ार का…औरऔर भी

शेयर बाज़ार के पुराने लोग राधा कृष्ण दामाणी को अच्छी तरह जानते होंगे। उन्हें ओल्ड फॉक्स, आरके, मिस्टर ह्वाइट जैसे कई नामों से जाना जाता है। उन्हें अपना गुरु मानते हैं राकेश झुनझुनवाला। सालों पहले किसी ने उनसे पूछा कि बाज़ार कैसा लग रहा है। उन्होंने कहा: अच्छा लग रहा है। सामनेवाले ने पूछा: क्या लूं। उन्होंने कहा: जो अच्छा लगे, ले लो। सार यह कि कमाने के लिए हमें अपना सिस्टम बनाना होगा। अब हमारा इनपुट…औरऔर भी

ट्रेडर तो हर कोई बन सकता है क्योंकि जिसके पास भी पूंजी है वो शेयर बाज़ार में खरीदना-बेचना शुरू कर सकता है। लेकिन कामयाब ट्रेडर बनना बेहद कठिन है। संन्यासी जैसा निर्मोही और योद्धा जैसा निपुण। पुरानी सोच को घिस-घिसकर निकालना पड़ता है, अपने हथियार पर सान चढ़ानी पड़ती है। दरअसल, शेयर बाज़ार बना ही ऐसा है जहां मुठ्ठी भर जीतते हैं और खांची भर हारते हैं। जो दृष्टा है, वही जीतता है। अब आज का बाज़ार…औरऔर भी

शेयर बाज़ार बढ़ता है। सेंसेक्स और निफ्टी बढ़ते हैं। लेकिन रिटेल निवेशक जहां भी हाथ डाले, घाटा ही खाता है। क्यों? इसलिए कि वो निवेश की अपनी कोई पद्धति या अनुशासन नहीं पकड़ता। बस, औरों की सुनता है। डिविडेंड डार्लिंग में बताते हैं कि चंबल फर्टिलाइजर्स का डिविडेंड यील्ड 5.26% है। नहीं बताते कि यह स्टॉक पांच सालों में 29 से 36 तक ही पहुंचा है। 4.4% का सालाना रिटर्न! दरअसल, मुनाफे के दो अहम पहलू हैं…औरऔर भी

मन को न संभाले तो हर ट्रेडर जुए की मानसिकता का शिकार होता है। मान लीजिए, नौ बार सिक्का उछालने पर टेल आए तो हममें से ज्यादातर लोग मानेंगे कि अगले टॉस में हेड आना पक्का है। जबकि वास्तविकता यह है कि पिछले नौ की तरह दसवें टॉस में भी हेड या टेल की संभावना 50-50% है। इसी मानसिकता में बार-बार नुकसान खाकर हम लंबा दांव खेल सब गंवा बैठते हैं। अब करें सही दांव की शिनाख्त…औरऔर भी