बचत को अलग-अलग आस्तियों में लगाने को पोर्टफोलियो प्रबंधन भी कहा जाता है। आम लोग ज्यादातर निवेश बैंक एफडी, सोने या रियल एस्टेट में करते हैं। बाकी आस्तियों में निवेश इसलिए नहीं करते क्योंकि वहां मूलधन ही डूबने का रिस्क होता है। लेकिन लंबे समय में सबसे ज्यादा रिटर्न शेयरों में निवेश से मिलता है। ट्रेडिंग में भी हलचल अधिक होने से कमा सकते हैं। मगर, इसके लिए रिस्क संभालना मूल शर्त है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

हकीकत में हमें किसी विशेषज्ञ सलाह या ब्रोकर के एसएमएस की ज़रूरत नहीं होती। मेहनत व अनुशासन की राह पर चलें तो हम अपना निवेश खुद संभाल सकते हैं। यहां तक कि ट्रेडिंग में भी अभ्यास से नियमित कमाई कर सकते हैं। इसके लिए हमें तीन खास बातों का ध्यान रखना होता होता है। ये हैं: बचत को अलग-अलग आस्तियों में सही अनुपात में लगाना, रिस्क संभालना और सही कंपनी का चयन। अब लगाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी

पहले अनाप-शनाप नाम से एसएमएस भेजकर उल्लू बनाते थे। अब ब्रोकर हाउसेज़ के नाम पर झांसा दिया जा रहा है। जनवरी में मेरे पास निर्मल बंग सिक्यूरिटीज़ के नाम से एसएमएस आया कि संग फ्रोइड लैब्स में खरीद रिपोर्ट आनेवाली है। कंपनी को अमेरिका में राइटेन सिरप बेचने की अनुमति मिल गई है। बिक्री 400% बढ़ेगी। शेयर 22 पर है। 50 तक जाएगा। फौरन खरीद लें। वो शेयर अभी 5.87 रुपए पर है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

एक्सपर्ट के नाम पर उल्लू बनाने का धंधा खूब चला हुआ है। विज्ञान में विशेषज्ञों की राय की अहमियत ज़रूरत होती है। यह बात अलग है कि मेडिसिन और रसायन शास्त्र तक में नोबेल पुरस्कार विजेता गलत साबित हो चुके हैं। इसलिए कम से कम फाइनेंस में विशेषज्ञों की कतई नहीं सुननी चाहिए क्योंकि वे निष्पक्ष विश्लेषक नहीं, बल्कि खुद धंधे में लिप्त लोग हैं और तथ्यों पर नहीं, स्वार्थों पर चलते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

संस्कृत की मशहूर कहावत है कि संशयात्मा विनश्यति। लेकिन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में सफलता के लिए ज़रूरी है कि इंसान बेधड़क शेर की तरह नहीं, बल्कि हर आहट पर चौंकने वाले हिरण जैसा बर्ताव करे। रिस्क उतना ही उठाए जिसे संभालना उसके वश में हो। यहां जो भी अनुशासन तोड़ सीमा लांघने का दुस्साहस करते हैं, वे निर्विवाद रूप से खत्म हो जाते हैं। यहां संशय और सतर्कता ज़रूरी है। अब करते हैं शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

हाल ही में एक मंजे हुए ट्रेडर मिले। पहले नॉन-फेरस मेटल के ट्रेडर थे। रिटायरमेंट के बाद शेयरों में ट्रेडिंग करने लगे। लेकिन अब वहां से भी तौबा कर ली। बताने लगे कि उन्हें शॉर्ट करने का अच्छा-खासा अभ्यास है। गिना कि निफ्टी कहां तक गिर सकता है। फिर शॉर्ट करने लगे। स्टॉप-लॉस लगाने की ज़रूरत नहीं समझी। अपने पर भरोसा था। चिपकने के इस चक्कर में सारी ट्रेडिंग पूंजी स्वाहा हो गई। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

कितना भी बुरा होता रहे, लेकिन हमेशा यही सोचो कि आगे अच्छा ही होगा। यह आशावाद जीवन में शांति और सफलता के लिए नितांत आवश्यक है। लेकिन ट्रेडिंग में यह आशावाद हमें कहीं का नहीं छोड़ता। शेयर यह सोचकर खरीदा कि बढ़ेगा। लेकिन वो गिरता गया, फिर भी आशा बांधे रहे कि एक दिन यह ज़रूर उठेगा और फायदा कराएगा। अंततः वो शेयर दो कौड़ी का रहकर गले की हड्डी बन जाता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

आम जीवन में बहादुरी बहुत ज़रूरी है। अंतिम जीत उसकी होती है जो प्रतिकूल से प्रतिकूल हालात में भी पीठ दिखाकर नहीं भागता और आखिरी दम तक लड़ता रहता है। लेकिन ऐसे योद्धा वित्तीय बाज़ार के मैदान में बहुत जल्दी वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं। बहादुरी के चक्कर में ऐसा घाटा लगता है कि किसी से नज़रें मिलाने तक के काबिल नहीं रहते। मनोचिकित्सक भी उन्हें अवसाद से बाहर नहीं निकाल पाता। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

यूं तो शेयर बाज़ार या किसी भी वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग आम जीवन का ही हिस्सा है। लेकिन आम जीवन के मूल्य यहां एकदम काम नहीं आते। मसलन, माना जाता है कि जीवन में भावनाएं बहुत ज़रूरी हैं। उनके बिना ज़िंदगी एकदम सारहीन, रूखी-सूखी हो जाती है। लेकिन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में भावनाएं सबसे बड़ी बाधक हैं। वहां जैसे ही आप भावनाओं में पड़ते हो, दूसरा आपको साफ कर देता है। अब परखें सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में संजीदा निवेशकों की कई अलग श्रेणियां हैं। वे बाज़ार में अलग वक्त पर घुसते और निकलते हैं। सबसे पहले कंपनी का दमखम जानने के बाद स्मार्ट व प्रोफेशनल निवेशक एंट्री लेते हैं। उसके बाद सिस्टम ट्रेडर व संस्थाएं। फिर आते हैं प्रोफेशनल ट्रेडर और तब घुसते हैं म्यूचुअल फंड। इनका बटोरना खत्म हो जाने के बाद टीवी व अखबारों में शोर मचता है। तब जाकर रिटेल निवेशक जगते हैं। अब करें शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी