इस बार जुलाई में शेयर बाज़ार का जो हाल रहा है, वह 17 सालों का सबसे बड़ा झटका है। सेंसेक्स जुलाई 2002 में 7.92% गिरा था। उसके बाद वह इस जुलाई में 4.86% गिरा है। यह पिछले साल अक्टूबर के बाद किसी भी महीने में आई सबसे तीखी गिरावट है। जुलाई में छोटी कंपनियों की हालत ज्यादा ही खराब रही। इस दौरान बीएसई मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांक क्रमशः 7.87% और 10.87% गिरे हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ना उपभोक्ता की मांग और ना ही निजी निवेश। ऐसे में आर्थिक विकास आएगा कहां से! जुलाई में हमारे यहां कारों की बिक्री साल भर पहले की बनिस्बत 30.62% गिर गई। यह वाहन उद्योग के लिए दो दशकों का सबसे खराब जुलाई माह रहा। इस दौरान हमारी सबसे बड़ी यात्री वाहन निर्माता कंपनी मारुति सुज़ुकी की बिक्री 36.71% घटी है। लगातार नौ महीनों से देश में यात्री वाहनों की बिक्री घट रही है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अर्थव्यवस्था की चिंताजनक हालत सरकारी आंकड़ों तक में बोलने लगी है। चालू वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में केंद्र का कुल टैक्स संग्रह मात्र 1.36% बढ़ा है। यह पिछले एक दशक में टैक्स बढ़ने की सबसे कम दर है। बजट में इस साल के लिए लक्ष्य 18.6% ज्यादा टैक्स जुटाने का है। यह लक्ष्य हासिल करने के लिए बाकी तीन तिमाहियों में टैक्स संग्रह 22.3% बढ़ना चाहिए जो कतई संभव नहीं दिखता। अब मंगलवार की दृष्टि..औरऔर भी

शंख कितनी भी जोर से बजा लिया जाए, पर ‘अश्वत्थामा हतो, नरो वा कुंजरो वा’ का सच अब छिपाना संभव नहीं है। राहुल बजाज से लेकर लार्सन एंड टुब्रो के चेयरमैन ए.एम. नाइक और एचडीएफसी के चेयरमैन दीपक पारेख तक चेताने लगे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था धीमेपन का शिकार हो चुकी है। अर्थव्यवस्था के विकास को लेकर विश्वास डगमगा गया है। बैंक उधार देने से हिचक रहे हैं और सुरक्षित चलना चाहते हैं। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार का मौजूदा माहौल लालच और डर से फांस-दर-फांस भरा पड़ा है। अक्सर लगता है कि दांव लगा लो तो डूबने की कोई गुंजाइश नहीं। लेकिन अगले ही दिन शेयर 10% से ज्यादा डूब जाता है और कई दिनों तक डूबता ही रहता है। ऐसे में सीधा-सरल नियम है अनुशासन व रणनीति पर डटे रहना। आपने न्यूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न के लिए जो नियम बना रखे हैं, उन पर अडिग रहना। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

इस समय बाज़ार में जो स्थिति है, वह बड़ी भ्रामक है। बमुश्किल 50-100 शेयर हैं जो कुलांचे मारे जा रहे हैं। वहीं, बाकी डेढ़ हज़ार से ज्यादा शेयर रसातल का रुख किए हुए हैं। ऐसे शेयर जब कभी थोड़ा-बहुत बढ़ते भी हैं तो फौरन मुनाफावसूली से दबा दिए जाते हैं। बाज़ार की हालत देखकर समझदार लोगों का कहना है कि इस वक्त रिस्क लेने के बजाय कैश संभालकर रखना सबसे सुरक्षित पोजिशन है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार में बढ़ने और गिरने के असंतुलित व विपरीत स्वभाव को देखते हुए संकट का पहला संकेत मिलते ही जितना मिल रहा हो, उतने पर बेचकर निकल लेना चाहिए। संस्कृत में एक कहावत है कि सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पंडितः अर्थात सम्पूर्ण का नाश होते देखकर आधे को बचा लें और आधे का त्याग कर दें। हमेशा यह सच स्वीकार करके चलें कि निवेश व ट्रेडिंग निश्चितताओं का नहीं, प्रायिकताओं का खेल है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में मंदी के दौर का स्वभाव तेज़ी के दौर से एकदम उलटा होता है। मंदी में बाज़ार धीरे-धीरे नहीं, एकबारगी गिरता है। अक्सर होता यह है कि एक-दो साल में बाजार या कोई स्टॉक जितना बढ़ा होता है, वह सारी की सारी बढ़त चंद दिनों में स्वाहा हो जाती है। बहुत सारे स्टॉक्स धारदार चाकू की तरह गिरते हैं, जिन्हें पकड़ने की कोशिश में घाव और गहरे होते चले जाते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार जिस तरह से काम करता है, उसमें भावों का बढ़ना धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से होता है। असल में तेज़ी का बाज़ार हमेशा धीरे-धीरे करके बनता है, एकबारगी नहीं। वह एक-एक कदम, एक-एक सीढ़ी चढ़ता है। इसकी सीधी-सी वजह है कि भरोसे को बनने और बढ़ने में वक्त लगता है। इसलिए तेज़ी के बाज़ार में मौके हाथ से खटाक से नहीं निकल जाते। चूक जाने पर उन्हें दोबारा पकड़ा जा सकता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का सारा मंसूबा इस पर टिका है कि देश में भरपूर विदेशी निवेश आएगा। शेयरों के साथ उद्योग में भी। पर बिजनेस करने की आसानी के दावों के बावजूद विदेशी निवेशकों को चीन, वियतनाम या थाईलैंड ज्यादा रास आते हैं। कारण स्पष्ट है। विश्व व्यापार में हमारा हिस्सा 2% से कम है जबकि हमारे यहां ट्रांसफर-प्राइसिंग विवाद दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी