जिस अर्थव्यवस्था के आकार को लेकर सरकार पिछले कई साल से डींग मार रही थी कि हम दुनिया की पांचवीं के बाद चौथी अर्थव्यवस्था बन गए हैं और जल्दी ही तीसरी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं, उसका आकार 2022-23 को आधार वर्ष बनाते ही घट गया है। पुरानी सीरीज़ में 2022-23 में अर्थव्यवस्था का आकार या नॉमिनल जीडीपी ₹268,90,473 करोड़ था, जो नई सीरीज़ में इससे 2.9% कम ₹261,17,627 करोड़ निकला है। इसी तरह 2023-24 में नॉमिनलऔरऔर भी

मोदी सरकार की विशेषता यह है कि उसने अर्थव्यवस्था के हिसाब-किताब में सतही को असली और असली को नकली बना दिया है। पहले हम नॉमिनल जीडीपी के बजाय रीयल जीडीपी और उसकी विकास दर को देखते थे। लेकिन रीयल विकास दर अब इतनी नकली हो गई है कि असली तस्वीर जानने के लिए नॉमिनल या सतह पर तैरती विकास दर को देखना पड़ता है। लेकिन यह करतब भी काम नहीं कर रहा। चालू वित्त वर्ष 2025-26 मेंऔरऔर भी

अर्थशास्त्रियों और आईएमएफ व विश्व बैंक जैसी संस्थाओं के लिए देश का राजकोषीय घाटा, खासकर जीडीपी से उसका अनुपात बड़ा पवित्र मानक होता है। अपने यहां इसके ऊपर से एफआरबीएम एक्ट के तहत 31 मार्च 2021 तक राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3% तक ले आना था। कोरोना महामारी के चलते यह लक्ष्य नहीं पूरा हो सका। अब सरकार ने इसे 2030 तक खिसका दिया है। इस बार 1 फरवरी को बजट पेश हुआ तो वित्तमंत्री निर्मलाऔरऔर भी

जीडीपी की नई सीरीज़ में जो पद्धति अपनाकर गणना की गई है, उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके बड़बोले मंत्रियों व नेताओं की बोलती बंद कर दी है। 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का दावा करनेवालों के लिए अब 4 ट्रिलियन की बात करना भी मुश्किल हो गया है। पुरानी पद्धति के अनुसार जनवरी में आए पहले अग्रिम अनुमान वित्त वर्ष 2025-26 में नॉमिनल या वर्तमान मूल्यों पर जीडीपी ₹357.14 लाख करोड़ निकाला गया था। वहीं, नई सीरीज़औरऔर भी

जब दुनिया एप्सटीन फाइलों के खुलासों से निकलकर अमेरिका व इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध के चलते समूचे मध्य-पूर्व मे फैली अशांति में उलझी हुई थी और हम देश में कच्चे तेल व गैस की आपूर्ति का हिसाब लगा रहे थे, उसके ठीक पहले सरकार ने अर्थव्यवस्था या जीडीपी के साथ बड़ा खेला कर दिया। उसने राष्ट्रीय खातों के डेटा की नई सीरीज़ जारी कर दी, जिसमें जीडीपी और जीवीए की गणना का आधार वर्षऔरऔर भी

भारत दुनिया में अमेरिका व चीन के बाद कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। हम अपनी मांग का 88% कच्चा तेल आयात करते हैं। एलपीजी और एलएनजी की जरूरत का भी 80-85% आयात करते हैं। कच्चे तेल और गैस का बड़ा हिस्सा हम पश्चिम एशिया या मध्य-पूर्व के देशों से लाते हैं। अमेरिका-इज़राइल और ईरान के युद्ध से यह पूरा आयात खतरे में पड़ गया है, खासकर ईरान द्वारा होर्मुज़ स्ट्रैट को बंद करऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के तमाम मंत्री-संत्री अमेरिका व इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध पर कुछ भी साफ नहीं बोल रहे। उनके चंगू-मंगू और भड़वा-टाइप पत्रकार ज़रूर चिल्ला रहे हैं कि सरकार की विदेश नीति देशहित को केंद्र में रहकर चलती है और ईरान का साथ न देना भारत के राष्ट्रीय हित में है। कोई उनसे पूछे कि जो हमला समूची दुनिया के हित में नहीं है, वो भारत के हित में कैसेऔरऔर भी

डोनाल्ड ट्रम्प ललकार रहे हैं कि ईरान के खिलाफ युद्ध चार-पांच हफ्ते चलेगा। वहीं, ईराने अपने वजूद के लिए लड़ रहा है तो वह तब तक लड़ेगा, जब तक अमेरिका पीछे नहीं हट जाता। साथ ही इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू का सफाया उसका लक्ष्य है। ईरान बार-बार कह चुका है कि उसने तो डिप्लोमैसी का राह चुनी थी और युद्ध उस पर थोपा गया है। तथ्यों से भी यही सच निकलता है। जून 2025 में भीऔरऔर भी

ईरान पर अमेरिका व इज़राइल के हमले ने न केवल वहां के सत्ता शीर्ष को खत्म कर दिया है, बल्कि सारी दुनिया में भूचाल ला दिया है। पूरा मध्य-पूर्व सुलझ रहा है। ट्रम्प ईरान के अवाम को सत्ता कब्ज़ा करने के लिए उकसा रहे हैं। लेकिन ईरान सरकार में नेतृत्व की दूसरी रैंक ने मोर्चा संभाल लिया है। उसके लिए यह राजनीति ही नहीं, विचारधारा की लड़ाई है। ईरान पर हमले का रूस और चीन, दोनों नेऔरऔर भी

देश में सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) का अटका भुगतान बड़ी सरकारी व निजी कंपनियों से दिलवाने के लिए जनवरी 2017 से लागू ट्रेड रिसीवेबल डिस्काउंटिंग सिस्टम या ट्रेड्स (TReDS) की व्यवस्था अपनी सामर्थ्य दिखा चुकी है। लागू होने पहले साल वित्त वर्ष 2017-18 में इस प्लेटफॉर्म से छोटे उद्यमों को ₹950 करोड़ ही मिल सके। लेकिन वित्त वर्ष 2021-22 में यह रकम ₹40,000 करोड़ और वित्त वर्ष 2024-25 मे ₹2.33 लाख करोड़ तक जा पहुंची।औरऔर भी