ट्रेडिंग में धन प्रबंधन का एक तरीका पोजिशन साइज़िंग और दूसरा तरीका स्टॉप-लॉस है। स्टॉप-लॉस का स्तर हर शेयर के स्वभाव के हिसाब से तय होता है। वैसे, अगर आप ब्रोकरों या तथाकथित एनालिस्टों की सलाह पर गौर करें तो उनका स्टॉप-लॉस 5-10% तक के नुकसान का होता है। यह उनके फंसाने की चाल है। हमें रिस्क व रिवॉर्ड के आधार पर एक सौदे में 2% से ज्यादा नुकसान कतई नहीं उठाना चाहिए। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ट्रेडिंग पद्धति या सिस्टम के अनुशासन के बावजूद बाज़ार का रिस्क समाप्त नहीं होता। बाज़ार की असली चाल कभी भी हमारी गणना को मात दे सकती है। यह जोखिम संभालने के लिए पोजिशन साइजिंग और स्टॉप-लॉस का सहारा लिया जाता है ताकि हमारी ट्रेडिंग पूंजी को आंच न आए। पोजिशन साइजिंग में हम किसी एक सौदे में अपनी 2-5% से ज्यादा पूंजी नहीं डालते ताकि सौदा टूटे भी तो 95% पूंजी सलामत रहे। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

टेक्निकल एनालिसिस पुराने भावों के आधार पर नए भावों का अंदाज़ लगाने का माध्यम है। इसके अलग-अलग संकेतकों को मिलाकर बहुत सारी पद्धतियां लोग अपनाते हैं। इनके ही अनुशासन में बंधने पर कोई ट्रेडर मुनाफा कमा पाता है। पर, बड़ी खबर आ जाए तो ऐसी किसी भी पद्धति के परखच्चे उड़ जाते हैं। दुनिया के एक कोने में तितली तक का पंख फड़फड़ाना कहीं और तूफान के आने का सबब बन जाता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

पिछली बार हमने बात की थी ट्रेडिंग करते वक्त पद्धति और धन-प्रबंधन की। यहां पद्धति का मतलब यह है कि आप टेक्निकल एनालिसिस के किन इंडीकेटरों को मिलाकर सौदा करने का फैसला करते हैं। जैसे, एक पद्धति यह है कि जब कम समय के ईएमए की लाइन उससे ज्यादा समय के ईएमए को काटती ऊपर जा रही हो और एमएसीडी धनात्मक हो तो उस स्टॉक में लॉन्ग सौदा कर सकते हैं। अब परखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

ट्रेडिंग किन्हीं मायनों में बड़ी गूढ़ पहेली है और बहुत आसान भी। गूढ़ इसलिए कि जो इसके उस्ताद हैं, वो अपना हुनर किसी को बताते नहीं और जो नहीं जानते वो चैनलों से लेकर तमाम मीडिया में बकबक करते रहते हैं। आसान इसलिए कि ट्रेडिंग में सफलता के दो ही तरीके हैं। एक, आपके पास कोई न कोई पद्धति होनी चाहिए और दो, आपका धन-प्रबंधन चौकस होना चाहिए। इस पर कभी विस्तार से। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

क्या शेयर या किसी भी वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग सट्टा लगाने जैसा नहीं है? जब आप आंख मूंदकर मन के कहे मुताबिक दांव लगाते हैं तो यकीनन यह लॉटरी, जुआ या सट्टेबाज़ी से अलग नहीं। लेकिन, जब आप अवसरों की नापजोख के बाद ट्रेडिंग करते हो तो यह कतई सट्टेबाज़ी नहीं है। ट्रेडिंग में आप किस्मत से नहीं खेलते, बल्कि रिस्क लेते हो, जोखिम उठाते हो जिसका नफा-नुकसान आप पाते हो। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ब्रोकर, सब-ब्रोकर या जॉबर ट्रेडिंग करते हैं क्योंकि यही उनका पेशा है। बैंकों या वित्तीय संस्थाओं के ट्रेजरी विभाग के लोग ट्रेडिंग करते हैं क्योंकि यही उनकी नौकरी है। लेकिन जब सामान्य नौकरी करनेवाले ट्रेडिंग के फेर में पड़ते हैं तो अक्सर डूब जाते हैं। असल में नौकरी की हर महीने बंधी तनख्वाह की मानसिकता से ट्रेडिंग नहीं की जा सकती। ट्रेडिंग में कभी जमकर कमाई तो कभी महीनों तक सूखा रहता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

कोई स्टॉक एक दिन में 20% ऊपर-नीचे जा सकता है। संभव है उसका भाव एकदम शून्य हो जाए। ऐसी कोई भी आकस्मिकता शेयर बाज़ार में घट सकती है। क्या कभी आपने ऐसी स्थिति की कल्पना की है? क्या इसके लिए आप तैयार हैं? अगर हां, तभी आप सही मायनों में ट्रेडर हैं। ट्रेडिंग में उतरनेवाले हर शख्स को यह बात कसकर गांठ बांध लेनी चाहिए। यहां बुद्ध जैसी शांति व स्थितिप्रज्ञता ज़रूरी है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयरों के भाव चार चरणों में घूमते हैं। पहला चरण वो है जब भावी संभावनाओं को परखकर उसे दिग्गज संस्थान और समझदार निवेशक खरीदते हैं। दूसरे चरण में प्रोफेशनल ट्रेडर और म्यूचुअल फंड घुसते हैं। तीसरा चरण रिटेल ट्रेडरों की खरीद का होता है। लेकिन तब तक बढ़ने की गुंजाइश खत्म हो चुकी होती है और शेयर सीमित दायरे में भटकने के बाद गिरता चला जाता है। यह भावों का चौथा चरण है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

मान्यता है कि भारतीय बाज़ार का रुख विदेशी निवेशक संस्थाएं तय करती हैं। हो सकता है कि लंबे समय का सच यही हो। लेकिन फिलहाल तो लगता है कि देशी निवेशक संस्थाएं बाज़ार का रुख तय करने लगी हैं। जून महीने में अब तक हर दिन उन्होंने कैश सेगमेंट में शुद्ध खरीद की। इस दौरान विदेशी संस्थाओं की भारी बिकवाली के बावजूद बाज़ार बढ़ा है। देखते हैं, यह रुख कितना टिकता है। चलिए, करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी