अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो आता था, लेकिन निकलना नहीं। इसीलिए कौरव सेना के महारथियों ने उसे घेरकर मार डाला। अपने यहां भी निवेशक बाज़ार के बढ़ने पर ही कमा सकते हैं। निकलने पर कमाने का रास्ता उनके लिए बहुत उलझा और जोखिम भरा है। या तो इंट्रा-डे ट्रेडिंग या फ्यूचर्स व ऑप्शंस। साथ में स्टॉक लेंडिंग व बॉरोइंग का भी कुछ चक्कर है जो अपने-आप में बहुत उलझा हुआ है। अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

अगर आपने किसी और के भरोसे ट्रेडिंग से कमाई करने का मंसूबा पाल रखा है तो आपको इसे कल नहीं, आज ही छोड़ देना चाहिए क्योंकि जिस तरह खुद मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता, वैसे ही खुद मगजमारी किए बिना ट्रेडिंग से कमाना मुमकिन नहीं। जो लोग अचूक टिप्स देने का दावा करते हैं, वे दरअसल आपकी लालच और काहिली की भावना का इस्तेमाल कर अपनी जेब भरना चाहते हैं। आइए, अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ट्रेडिंग में भेड़चाल नहीं चलती, बल्कि यहां भेड़चाल चलनेवालों का ही शिकार किया जाता है। यहां लंबे समय में बाहरी सलाह या टिप्स का भी खास महत्व नहीं होता। यहां तो व्यक्तिगत करतब और प्रदर्शन ही काम आता है। इनपुट आप दस जगह से ले सकते हैं। लेकिन अंततः आपकी अपनी गणना और अनुशासन ही आपको लाभ दिला सकता है। याद रखें ट्रेडिंग बॉक्सिंग का खेल है, कोई फुटबॉल या हॉकी मैच नहीं। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

किसी शेयर के बढ़ने या गिरने के पीछे सीधा-सा फंडा यह होता है कि उसमें ठीक उस वक्त खरीदनेवालों का पलड़ा भारी है या बेचनेवालों का। टेक्निकल एनालिसिस के तमाम संकेतकों और कैंडल के पैटर्न से भी हम यही पकड़ने की कोशिश करते हैं। मगर दिक्कत यह है कि सचमुच की खरीद-फरोख्त बने-बनाए पैटर्न में फिट बैठ जाए, यह जरूरी नहीं है। इसलिए ट्रेडिंग में पक्के की नहीं, प्रायिकता की बात चलती है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

हर कोई समान राय का हो जाए तो बाज़ार कभी चलेगा ही नहीं। मैं कुछ सोचता हूं तो आप उससे अलग या उलट सोचें तभी बाज़ार चल सकता है। मैंने सोचा कि बाज़ार बढ़ेगा तो खरीदूंगा। आपने सोचा कि कैसा बौडम है, बाज़ार तो गिरने जा रहा है और आप बेचेंगे। आपकी बिक्री, मेरी खरीद। दोनों से मिलकर सौदा पूरा होगा और बाज़ार चलेगा। इसलिए एक ही समय सभी सही नहीं हो सकते। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

हम वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग को इसीलिए चुनते हैं ताकि किसी बॉस की किटकिट न रहे। हम मालिक हों अपनी मर्जी के। आज़ाद हों। जब मन चाहे काम करें, न चाहे तो मौज करें। लेकिन यहां पहुंचते ही हम भावनाओं के गुलाम बन जाते हैं। फिर बाज़ार ऐसा धोबियापाट मारता है कि हम उठने-बैठने के काबिल तक नहीं रह जाते। अरे भाई, कमाने के लिए रोज़ाना ट्रेडिंग ज़रूरी तो नहीं! आइए, अब आखिरी दिन शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सरकारें अक्सर घबरा जाती हैं कि शेयर बाज़ार कहीं ज्यादा न गिर जाए। अपने यहां भी मोदी सरकार बाज़ार गिरते ही फौरन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को पटाने में लग जाती है। हालांकि विदेशी निवेशक ज्यादा पाने की फिराक में लगे रहते हैं और बाज़ार का खेल जारी रहता है। वैसे भी, जानकार कहते हैं कि जब चीन जैसी मजबूत सरकार शेयर बाजार को नहीं संभाल पा रही है तो भारत की क्या बिसात! अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अजीब अंधेरगर्दी है वित्तीय बाज़ार के विद्वानों व विश्लेषकों की। एक तरफ कहते हैं कि रिजर्व बैंक को ब्याज दरें घटा देनी चाहिए ताकि बैंक उद्योग को कम ब्याज पर ऋण दे सकें और आर्थिक विकास तेज़ हों। वहीं, जब एचडीएफसी बैंक ने आधारभूत ब्याज दर 9.70 से घटाकर 9.35% कर दी तो कहने लगे कि इससे दूसरे बैंक भी ऐसा करने को मजबूर हो जाएंगे तो बैंकिंग उद्योग का मार्जिन घट जाएगा। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

मूल्य खोज का अंतिम फायदा कंपनियों को होता है। इसलिए वे चाहती हैं कि शेयर बाज़ार में सक्रियता बनी रहे। वे मीडिया पर विज्ञापन से लेकर स्टॉक एक्सचेंजों को लिस्टिंग फीस वगैरह देती हैं। बाज़ार में रोज़ाना के खेल में एक का नफा, दूसरे का नुकसान होता है। अपने यहां विदेशियों से उलट चलती हैं देशी संस्थाएं। इसके दम पर एलआईसी ने 2014-15 में बाज़ार से 24,373 करोड़ रुपए का मुनाफा बटोरा है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

बात बराबर है कि बाज़ार, प्राइस डिस्कवरी या मूल्य खोज का माध्यम है। पर इस खोज को कितने झंझावात और कैसे-कैसे प्रभावों से गुजरना होता है, यह पिछले हफ्ते ने खुलकर बता गिया। सोमवार को चीन से असर से बाज़ार इतना गिरा कि लोगो को 1987 के काले सोमवार की याद आ गई। यह बाज़ार की कड़वी हकीकत है। लेकिन यह भी सोचिए कि इसमें कमाता कौन और गंवाता कौन है? अब पकड़ते हैं सोमवार की दशा-दिशा…औरऔर भी