देश 67वें गणतंत्र दिवस तक आ पहुंचा। लेकिन क्या हम गणतंत्र में गण यानी अपनी भूमिका समझते हैं? एक बात जान लें कि गणतंत्र में गण ही संप्रभु होता है। सारी सत्ता जनता में ही निहित है। लेकिन गूंगे को बोलने और पंखहीन को उड़ने की आज़ादी का क्या मतलब है! इसी तरह अवाम के ज्ञानवान बने बिना कोई भी गणतंत्र या अर्थतंत्र मजबूत नहीं होता। इसलिए ज्ञानवान बनना हमारा परम कर्तव्य है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

टेलिविज़न महंगा हो जाए या दाल महंगी हो जाए तो इससे उपभोक्ता को फर्क पड़ता है, व्यापारी को नहीं। उसे तो अपने मार्जिन से मतलब है जिसकी एक निश्चित रेंज होती है। माल महंगा मिला तो महंगा बेचेगा, सस्ता मिला तो सस्ता। माल के दाम उसके वश में नहीं। इसी तरह वित्तीय बाज़ार का ट्रेडर मूलतः व्यापारी है। भावों की मगज़मारी छोड़ उसकी नीति होनी चाहिए – थोक में खरीदो, रिटेल में बेचो। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार बड़ा छलिया है। लगातार पांच-दस दिन अंदाज़ सही बैठता है तो किसी को भी लगने लगता है कि वो तो बाज़ार का मास्टर हो गया। लेकिन अगले ही दिन बाज़ार ऐसा गच्चा देता है कि सारी कमाई एक दिन में स्वाहा हो जाती है। अंदाज़ या गणना का आधार पुराना पैटर्न होता है और पुराना पैटर्न आगे दोहराया जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। इसलिए बाज़ार में अहंकारी नहीं, विनम्र बनिए। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

जिस तरह बड़े-बड़े ज्योतिषी तक भविष्य को कभी नहीं बांध सकते, उसी तरह बाज़ार को बांधना किसी के वश की बात नहीं। हम क्या हो सकता है, उसकी प्रायिकता की गणना भर सकते हैं। एनालिस्ट लोगों को बोलने दीजिए कि सेंसेक्स या निफ्टी अगली दीवाली तक कहां जाएगा क्योंकि यही उनका धंधा है। लेकिन हमें तो गांठ बांध लेनी चाहिए कि बाज़ार से पंगा लेना पहाड़ से सिर टकराने जैसा है। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अक्सर लोगबाग पूछते हैं कि शेयर बाज़ार यहां से आगे कहां जाएगा? यह उन लोगों को सोच है जो या तो एकदम नौसिखिया हैं या ताज़िंदगी छिछली खिलाते रह गए। प्रोफेशनल ट्रेडर कभी नहीं सोचता/पूछता कि बाज़ार आगे कहां जाएगा। इस सवाल पर उसका जवाब होता है – बाज़ार कहीं भी जाए, मेरी बला से! वो देखता है कि बाज़ार की चाल दरअसल क्या है जिसके हिसाब से वो ट्रेड करता है। अब पकड़िए मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

भविष्य की बात कौन नहीं जानता चाहता! आम जीवन में लोग इस कुतूहल को शांत कर थोड़ा आश्वस्त हो जाते हैं, जबकि शेयर बाज़ार में लोग इससे नोट बनाना चाहते हैं। लेकिन पक्की बात यह है कि भविष्य के बारे में भगवान भी कुछ पक्का नहीं कह सकता। उसको लेकर महज कयास लगाए जा सकते हैं। शेयर बाज़ार में इसे ही सट्टेबाज़ी या सटोरियापन कहते हैं। लेकिन ट्रेडिंग इससे आगे की चीज़ है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

स्टॉक्स को चुनने व समझने में टेक्निकल चार्ट काम आते हैं। लेकिन चार्ट अपने-आप में पर्याप्त नहीं क्योंकि वे पुराने भावों से बनते हैं और, हम समय में पीछे जाकर ट्रेड नहीं कर सकते। चार्ट की उपयोगिता यह है कि हम उससे अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कोई स्टॉक कमज़ोर हाथों (डे-ट्रेडरों व सटोरियों के हाथों) से मजबूत हाथों (इनसाइडरों, प्रॉपराइटरी ट्रेडरों व संस्थाओं) में जा रहा है या स्थिति इससे उलट है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

खुद को बड़ा उस्ताद बताने वालों के पास असल में कोई नई खबर नहीं होती। होती भी है तो बहुत पहले पिट चुकी होती है। खुद का उल्लू सीधा करना ही इनका मकसद है। इसलिए इनके किसी भी संदेश को तवज्जो नहीं देना चाहिए। ऐसे टिप्स देने वाले तो आजकल सोशल मीडिया पर भी छाने लगे हैं। उन्हें छोड़िए। अपना सिस्टम बनाइए। काम के 10-15 स्टॉक्स चुनिए, उनका स्वभाव समझिए और ट्रेड कीजिए। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

सनसनी महज न्यूज़ चैनलों पर ही नहीं, शेयर बाज़ार में भी फैलाई जाती है। स्मार्टफोन से खटाखट संदेश भेजे जाते हैं। अब तो व्हाट्स अप का ज़माना है। किसी वाहियात कंपनी का नाम लेकर बताते हैं कि बड़ा ब्रोकिंग हाउस उस पर खरीद रिपोर्ट जारी करनेवाला है। रिपोर्ट आते ही 22 रुपए से अगले हफ्ते यह शेयर 50 तक पहुंच जाएगा। इसलिए फटाफट खरीद लें। वरना पछताएंगे। उनकी इस चाल में फंसे बगैर देखें बुध की बुद्धि…औरऔर भी

बाज़ार में अफवाह फैलाने के पीछे शोबाज़ मानसिकता के ही लोग होते हैं। दिखाते ऐसे हैं कि रतन टाटा, मुकेश अंबानी या कुमारमंगलम बिड़ला तक इनकी सीधी पहुंच हो। वित्त मंत्रालय के आला अधिकारियों और वित्त मंत्री अरुण जेटली को तो ये लोग जेब में लिए टहलते हैं। असल में ये लोग मानसिक रूप से बीमार होते हैं। इसलिए हमें न तो उनका अपमान करना चाहिए, न ही उन्हें कोई अहमियत देनी चाहिए। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी