हाल ही में एक मंजे हुए ट्रेडर मिले। पहले नॉन-फेरस मेटल के ट्रेडर थे। रिटायरमेंट के बाद शेयरों में ट्रेडिंग करने लगे। लेकिन अब वहां से भी तौबा कर ली। बताने लगे कि उन्हें शॉर्ट करने का अच्छा-खासा अभ्यास है। गिना कि निफ्टी कहां तक गिर सकता है। फिर शॉर्ट करने लगे। स्टॉप-लॉस लगाने की ज़रूरत नहीं समझी। अपने पर भरोसा था। चिपकने के इस चक्कर में सारी ट्रेडिंग पूंजी स्वाहा हो गई। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

कितना भी बुरा होता रहे, लेकिन हमेशा यही सोचो कि आगे अच्छा ही होगा। यह आशावाद जीवन में शांति और सफलता के लिए नितांत आवश्यक है। लेकिन ट्रेडिंग में यह आशावाद हमें कहीं का नहीं छोड़ता। शेयर यह सोचकर खरीदा कि बढ़ेगा। लेकिन वो गिरता गया, फिर भी आशा बांधे रहे कि एक दिन यह ज़रूर उठेगा और फायदा कराएगा। अंततः वो शेयर दो कौड़ी का रहकर गले की हड्डी बन जाता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

आम जीवन में बहादुरी बहुत ज़रूरी है। अंतिम जीत उसकी होती है जो प्रतिकूल से प्रतिकूल हालात में भी पीठ दिखाकर नहीं भागता और आखिरी दम तक लड़ता रहता है। लेकिन ऐसे योद्धा वित्तीय बाज़ार के मैदान में बहुत जल्दी वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं। बहादुरी के चक्कर में ऐसा घाटा लगता है कि किसी से नज़रें मिलाने तक के काबिल नहीं रहते। मनोचिकित्सक भी उन्हें अवसाद से बाहर नहीं निकाल पाता। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

यूं तो शेयर बाज़ार या किसी भी वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग आम जीवन का ही हिस्सा है। लेकिन आम जीवन के मूल्य यहां एकदम काम नहीं आते। मसलन, माना जाता है कि जीवन में भावनाएं बहुत ज़रूरी हैं। उनके बिना ज़िंदगी एकदम सारहीन, रूखी-सूखी हो जाती है। लेकिन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में भावनाएं सबसे बड़ी बाधक हैं। वहां जैसे ही आप भावनाओं में पड़ते हो, दूसरा आपको साफ कर देता है। अब परखें सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में संजीदा निवेशकों की कई अलग श्रेणियां हैं। वे बाज़ार में अलग वक्त पर घुसते और निकलते हैं। सबसे पहले कंपनी का दमखम जानने के बाद स्मार्ट व प्रोफेशनल निवेशक एंट्री लेते हैं। उसके बाद सिस्टम ट्रेडर व संस्थाएं। फिर आते हैं प्रोफेशनल ट्रेडर और तब घुसते हैं म्यूचुअल फंड। इनका बटोरना खत्म हो जाने के बाद टीवी व अखबारों में शोर मचता है। तब जाकर रिटेल निवेशक जगते हैं। अब करें शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

आदर्श बाज़ार जैसा कुछ नहीं। वो महज एक परिकल्पना है। निहित स्वार्थ बाज़ार को अपने हिसाब से नचाते हैं। इसलिए देश ही नहीं, विदेश तक में बराबर घोटाले सामने आते रहते हैं। लेकिन पकड़े जाने पर उनके खिलाफ कार्रवाई भी होती है। अपने यहां भी शेयर बाज़ार में सही शक्तियों के साथ ही ऑपरेटर भी खूब खेल करते हैं। बहुत सारे स्टॉक्स ऑपरेटरों द्वारा चलाए जाते हैं। हमें ऐसे स्टॉक्स से बचना चाहिए। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

हमारे-आप जैसे अधिकांश लोगों के मन में यह धारणा भरी हुई है कि शेयर बाज़ार ऐसा बाज़ार है जहां आप मुनाफा खरीद सकते हैं। थोड़ी-सी पूंजी लेकर जाइए और चंद दिनों या महीनों में उसे कई गुना कर लीजिए। मगर, यह धारणा जब ज़मीनी हकीकत से टकराती है तब कपड़े क्या, लंगोटी तक उतर जाती है। याद रखें, इस जहान में कोई ऐसा बाज़ार नहीं, जहां मुनाफा खरीदा जा सकता हो। अब लगाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार आम बाज़ारों जैसे नहीं हैं कि आप गए, दो-चार जगह मोलतोल किया और माल खरीद लिया। यहां आप खरीदार भी हैं और विक्रेता भी। दूसरे, यहां थोक व रिटेल बाज़ार अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ चलते हैं। यहां पुराने देशी खुर्राट ही नहीं, विदेश की दक्ष संस्थाएं भी जमकर काम करती हैं। किसी को भी अगर वित्तीय बाज़ार से कमाना है तो इसकी अन्य बारीकियों को बड़े कायदे से समझना होगा। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

पक्का है कि विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार से कमाते ही होंगे। लेकिन कितना? इसका अंदाज़ नहीं है। लेकिन उन्होंने बीते वित्त वर्ष में अपने शेयर बाज़ार से 14,172 करोड़ रुपए निकाले हैं। शायद सूचकांकों के गिरने की बड़ी वजह भी यही है। 2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद पहली बार उन्होंने इस तरह की शुद्ध निकासी की है। वैसे नए वित्त वर्ष के पहले महीने में उनकी खरीद चालू है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

एलआईसी ने बीते वित्त वर्ष में शेयर बाज़ार में 65,000 करोड़ रुपए लगाए, जिस पर उसने 11,000 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया। यह 16.92% का रिटर्न बनता है। इससे दो सबक सीखे जा सकते हैं। एक यह कि सेंसेक्स 10.33% गिरने के बावजूद बाज़ार से कमाया जा सकता है। दो, इतनी बड़ी रकम और कौशल के बावजूद वित्तीय संस्था भी 17% मुनाफा कमा पाती है। इसलिए 15-20% मुनाफे का लक्ष्य रखना सही है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी