पाप का घड़ा कब भरता है, पता नहीं। लेकिन बिजनेस चैनलों के एनालिस्टों और एंकरों के पाप बढ़ते जा रहे हैं। जिस निवेशक को जागरूक करने की बात करते हैं, डीलिंग-सेटिंग करके वे उसका ही शिकार करवाते हैं। सीएनबीसी के एक ऐसे ही स्टार एंकर अकूत कमाई के बाद फिलहाल आराम फरमा रहे हैं। अफसोस कि ‘आवाज़’ में भी ऐसी हाथ-सफाई चल रही है। इन चैनलों का शिकार होने से बचें। आज तथास्तु में एक लार्जकैप कंपनी…औरऔर भी

बढ़ने का नाम ज़िंदगी। जो ठहरा, वो निपटा। कंपनियों पर भी यह बात बराबर लागू होती है। धंधा लगातार बढ़े तो उसके शेयर चढ़ते हैं। किसको पता था कि फरवरी 1993 में 95 पर जारी इनफोसिस के शेयर इक्कीस साल बाद 4150 तक जानेवाले हैं। वो भी पांच बार 1:1 और एक बार 3:1 में बोनस शेयर के बाद। इसलिए यहां महंगा सस्ता 52 हफ्ते के उच्चतम/न्यूनतम से नहीं तय होता। तथास्तु में एक और संभावनामय कंपनी…औरऔर भी

उम्मीदें बनती हैं कि आनेवाले पांच-दस साल में कंपनी जमकर मुनाफा कमाएगी। वो उसके शेयर भाव में जज्ब हो जाती है। इसी तरह समग्र रूप से देश की अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक विकास की उम्मीद बनती है तो शेयर बाज़ार चढ़ जाता है। इससे कंपनियों के बाज़ार मूल्य और उन्हें फिर से बनाने की लागत में अंतर आ जाता है तो नए निवेश को प्रेरणा और अल्पकालिक विकास को गति मिलती है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

एफडी में धन लगाते हैं तो मकसद से। सोना खरीदते हैं तो मकसद से। लेकिन शेयर बाज़ार से या तो डरकर भागते हैं या सोचते हैं कि यहां धन को दोगुना-चौगुना दस गुना करना है। शेयरों में निवेश का यह नज़रिया सरासर गलत है। हमें शेयरों में निवेश हमेशा मकसद से जोड़कर करना चाहिए। लक्ष्य पूरा तो बगैर ज्यादा लालच किए बेचकर मकसद के लिए सुरक्षित एफडी या अन्य माध्यम में रख दिया। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी

याद रखें कि शेयर बाज़ार अपने-आप में कुछ नहीं। वो अंततः अर्थव्यवस्था की छाया है। हमारी अर्थव्यवस्था अभी उस मुकाम है जहां से उसकी अनंत संभावनाएं खुलने जा रही हैं। मंथन चल रहा है। तलहटी में पड़े मुद्दे उभर कर सामने आ रहे हैं। पूरा देश समाधान खोजने में लगा है। विदेश गई प्रतिभाएं वापस आती जा रही हैं। अब भविष्य किसी सरकार का मोहताज नहीं। ऐसे में तथास्तु लगा है अच्छी कंपनियां चुनकर सामने लाने में…औरऔर भी

पौधे ही किसी दिन पेड़ बनते हैं। पर शेयर बाज़ार को यह बात समझ में ही नहीं आती। बड़ी कंपनियों की दशा-दिशा दिखाने वाला बीएसई सेंसेक्स इस साल जनवरी से लेकर अब तक 7.65% बढ़ा है, पर मध्यम कंपनियों से जुड़ा बीएसई मिड कैप सूचकांक 9.66% और छोटी कंपनियों से जुड़ा बीएसई स्मॉल कैप सूचकांक 15.58% गिरा है। सो, मिड और स्मॉल कैप में अभी बढ़ने की काफी गुंजाइश है। तथास्तु में आज एक स्मॉल कैप कंपनी…औरऔर भी

कल क्या होगा, कोई नहीं जानता। भावी अनिश्चितता कोई मिटा नहीं सकता। यह शाश्वत सच है। सदियों से चला आ रहा है। लेकिन आज के जमाने में फर्क यह पड़ गया है कि अनिश्चितता को नाथने के साधन आ गए हैं, खासकर फाइनेंस के क्षेत्र में। बीमा यही तो करती है। इसी तरह स्टॉक्स में निवेश अगर लार्जकैप, मिडकैप व स्मॉलकैप में बांटकर किया जाए तो जोखिम बहुत घट जाता है। तथास्तु में आज एक मिडकैप स्टॉक…औरऔर भी

मशहूर विश्लेषक मार्क फेबर का मानना है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था इस समय साल 2008 से भी बदतर अवस्था में है। जबरन कम रखी ब्याज दरों का विस्तार अमेरिका से लेकर यूरोप तक हो चुका है। हर महीने 85 अरब डॉलर के नोट झोंकने के बावजूद अमेरिकी अर्थव्यवस्था संतोषजनक स्थिति में नहीं आ पाई है। भारत व चीन जैसे उभरते देश भी सुस्त पड़ते दिख रहे हैं। ऐसे माहौल में ऐसी कंपनी, जिसका आधार बड़ा मजबूत है…औरऔर भी

जब लार्जकैप या बड़ी कंपनियों में जमकर खरीद हो चुकी होती है तो उनमें कुछ दिनों के लिए मुनाफावसूली चल निकलती है। ठीक इसी वक्त मिडकैप स्टॉक्स में खरीद बढ़ने लगती है और वे फटाफट उढ़ने लगते हैं। फिलहाल बाज़ार का यही हाल है। लेकिन जैसे ही कोई बुरी खबर आएगी, यही मिडकैप स्टॉक्स बड़ी तेज़ी से गिरेंगे, जबकि लॉर्जकैप या तो संभले रहेंगे या गिरेंगे तो बहुत थोड़ा। इस सावधानी के साथ अब नज़र आज पर…औरऔर भी